सतीश चंद्र मिश्रा : हिंदू महासभा का सच और विपक्षी कऊव्वों का विधवा विलाप, जाने कौन कांग्रेसी नेता इससे जुड़े थे..!

जाते हुए वर्ष 2025 की अंतिम जूतांजलि…
हिंदू महासभा का सच और विपक्षी कऊव्वे….
विपक्षी कऊव्वों का इस बात पर गला फाड़कर चिल्लाते हुए, अपनी छाती पीटते हुए आप लोगों ने देखा होगा कि, हिंदू महासभा अंग्रेजों के दलालों का संगठन था और उसने स्वतंत्रता संग्राम में कोई भाग नहीं लिया, बल्कि बंगाल में मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनायी और जिन्ना के साथ मिलकर पाकिस्तान बनवाया।
विपक्षी कऊव्वों के इस विधवा विलाप का सच जानने के लिए यह जानिए कि, अप्रैल 1915 में हरिद्वार में आयोजित कुंभ में हिंदू महासभा की स्थापना हुई थी।
विपक्षी कऊव्वों के कपड़े फाड़ने की कहानी इसके बाद शुरू होती है।
स्वतंत्रता से पहले 1948 तक अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची नीचे दी जा रही है।

हिंदू महासभा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय थे (1915 – 1921) तक, मालवीय जी 1909, 2018, 1932 और 1933 में चार बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। यानि हिंदू महासभा का अध्यक्ष बनने के बाद लगातार दो बार कांग्रेस ने उनको अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना, यानि कांग्रेसी विपक्षी कऊव्वों के हिसाब से अंग्रेजों के दलाल को कांग्रेस ने लगातार दो बार अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना था। लेकिन विपक्षी कऊव्वों की कालिख यहीं नहीं रुकती।

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मालवीय जी के बाद हिंदू महासभा के अध्यक्ष का पदभार पूरे दस साल तक संभाला लाला लाजपत राय जी ने। समयावधि थी 1921 से उनके निधन तक। लाला लाजपत राय भी 1920 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे थे।

इसके बाद बालकृष्ण शिवराम मुंजे 1931 से 1937 तक और विनायक दामोदर सावरकर 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। इन दोनों में से भी एक बालकृष्ण शिवराम मुंजे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के करीबी सहयोगी रहे। 1907 के सूरत अधिवेशन में उन्होंने तिलक के गरम दल का खुलकर समर्थन किया।
गांधीजी की अहिंसा और मुस्लिम तुष्टीकरण नीतियों से असहमति के कारण 1920 के बाद वे कांग्रेस से अलग हो गए थे। केवल वीर सावरकर का कांग्रेस से कोई संबंध संपर्क नहीं था।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। विपक्षी कऊव्वों को इसके आगे का इतिहास जलते, धधकते हुए तवे पर नंगा कर के बैठा देगा।
क्योंकि वीर सावरकर के बाद 1943 में ही हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने डॉ श्यामप्रसाद मुखर्जी और उनके बाद डॉ संपूर्णानंद 1948 में अध्यक्ष बने। यही वह विशेष कालखंड है, जिस कालखंड को लेकर विपक्षी कऊव्वे राग अलापते हैं कि, हिंदू महासभा की जिन्ना से सेटिंग थी। बंगाल में सरकार और पाकिस्तान बनवाने में भूमिका थी।
लेकिन विपक्षी कऊव्वे यह कभी नहीं बताते कि, जिन डॉ संपूर्णानंद के अध्यक्ष काल में उपरोक्त राष्ट्रघाती पाप होने का आरोप वो लगा रहे हैं, उन्हीं डॉ संपूर्णानंद को विपक्षी कऊव्वों के राजनीतिक पुरखों ने उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में 28 दिसंबर 1954 से 7 दिसंबर 1960 तक नियुक्त किया था। इसके बाद डॉ संपूर्णानंद राजस्थान के राज्यपाल (16 अप्रैल 1962 – 15 अप्रैल 1967) भी रहे।
अब जरा गौर करिए कि, विपक्षी कऊव्वे जिस हिंदू महासभा पर अंग्रेजों की दलाली करने, स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लेने का आरोप गला फाड़ फाड़कर आज लगाते हैं। उस हिंदू महासभा का ब्रिटिश शासनकाल में कुल जीवनकाल 32 वर्ष रहा। इन 32 वर्षों में से 16 वर्ष (50 प्रतिशत) समय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे दो महानुभाव ही थे।
उन 32 साल में 26 साल ( 81 प्रतिशत) समयावधि में हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे महानुभाव कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा बाद में देश के सबसे बड़े राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
अतः आप स्वयं तय करिए कि, विपक्षी कऊव्वो का हिंदू महासभा के विरुद्ध विधवा विलाप

उपरोक्त तथ्यों की जांच बड़ी आसान है। ऊपर उल्लिखित किसी भी नाम को Google पर लिखिए, पूरा जीवन परिचय सामने आ जाएगा, जो विपक्षी कऊव्वो के झूठ को उसी तरह नंगा करेगा, जैसे प्याज के छिलके उतारे जा रहे हों
बाकी तो जो सो हइय्ये है….

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