परख सक्सेना : 1980-90 के दशक मे जापान आईटी मे आगे था तब हमारे यहाँ आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद…

भारत ने जापान की अर्थव्यवस्था को पछाड़ा तो विधवा आलाप शुरू हो गया कि जापान की प्रतिव्यक्ति आय ज्यादा है, रोड इंफ्रास्ट्रक्चर एजुकेशन और जितनी अंग्रेजी सीखी है उतने सारे शब्द जोड़कर भारत को कमतर बताने का खेल शुरू।

वैसे हम चाहे तो जापान की प्रतिव्यक्ति आय को एक साल मे मात दें सकते है, इसके दो रास्ते है। पहला हम देश के ऐसे 105 करोड़ लोगो को मार डाले जो गरीब तबगे से आते है या अर्थव्यवस्था मे ज्यादा योगदान नहीं देते।

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दूसरा रास्ता है कि देश के सभी लोग 1 अप्रेल को अपने अपने घर खाली कर दें और सड़को पर आ जाए, सारे जंगल काट दो और इन जगहों पर फैक्ट्री बना दो। यदि पूरे देश मे सिर्फ फैक्ट्री ही फैक्ट्री हो जाये तो एक साल मे देश की जीडीपी ग्रोथ जो अभी 8 प्रतिशत है वो 8 हजार प्रतिशत हो जाएगी और इस तरह अगले 31 मार्च तक भारत जापान से आगे खड़ा होगा।

बकवास लगा? तो फिर शुरुआत किसने किया?

गणित का एक छोटा सा समीकरण तो पता नहीं और प्रति व्यक्ति आय का ज्ञान दें रहे हो? अंश बटा हर, या तो जीडीपी अचानक से बढ़ा दो या आबादी घटा दो, नहीं कर सकते तो जो प्राकृतिक वृद्धि है उसे चलने दो।

जापान की कम आबादी होना या कम क्षेत्रफल होना कोई श्राप नहीं है बल्कि ये कई मायनो मे भारत और चीन से बेहतर है। इतनी कम आबादी होती है तो नीतियां बनाना मुश्किल नहीं होता, जापान के 15 मे से 12 करोड़ लोग सिर्फ एक हिस्से मे रहते हैं देश का एक बड़ा भूभाग खाली पड़ा है। हमारे यहाँ लद्दाख से अंडमान लोग ही लोग है।

जापान मे जापानी शिक्षा पद्धति लागू है, भारत मे भारतीयता की बात करना आज भी एक वर्ग के लिए पाप है। जापान ने अपनी रक्षा पर कोई विशेष खर्च नहीं किया है जबकि भारत ने 5 तो व्यापक युद्ध झेले है और प्रॉक्सी वॉर की तो संख्या ही नहीं है।

बेशक आप कह सकते है कि जापान मे प्राकृतिक आपदा आती है, लेकिन ये आपदा 1945 के बाद नहीं आ रही। उनके लिए प्राकृतिक आपदा एक रोग की तरह है जिसका इलाज उनके पास सदियों से है। भारत को पहले मुगलो ने नोचा जैसे तैसे उनसे बचे तो अंग्रेजो ने, भारत को बाध्य किया गया कि वो अपना प्राचीन ज्ञान गवा दें।

आज भी यदि वैदिक गणित और वैदिक विज्ञान की बात करो तो भारत का एक वर्ग इसे बेकवर्ड समझता है जबकि वही बात कोई जापानी करें तो ताली बजाने लगेगा। दरसल हम एक ऐसे पहचान संकट मे है कि देश कितना ही अच्छा कर ले हमें उसकी निंदा करनी है।

जापान की आबादी कम है लेकिन भारत की भी जो आबादी है इसमें कुछ आबादी तो सिर्फ बोझ है, जिसमे ये प्रति व्यक्ति आय गिनने वाले भी शामिल है जिन्हे गणित का एक साधारण सूत्र नहीं पता। पुनरावृति करूँगा, आबादी से कुछ नहीं होता।

भारत ने दुनिया के लिए अपना बाजार 1991 मे खोला जबकि जापान ने 1922 मे, 70 साल तो हम यही पीछे थे। जापान मे स्टार्टअप कल्चर 1930 से दिखने लगा हमने 2014 के बाद शुरू किया। 1980-90 के दशक मे जापान आईटी मे आगे था तब हमारे यहाँ आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद अपनी ऊंचाई पर थे।

जापान मे मेड इन जापान का कल्चर 200 साल से है, भारत मे जाहिलपन की सीमा ये है कि कुछ लोग कहते है कि मेक इन इंडिया के नाम पर सिर्फ असेम्बलिंग होती है उत्पादन नहीं। ये तो ज्ञान का हाल है और ये बोलने वाले कोई अनपढ़ नहीं है बल्कि ठीकठाक डिग्रीधारी लोग है।

इसलिए भारत ने जापान को पीछे किया इसका उत्सव मनाइये, जापान से बड़े और ज्यादा आबादी वाले कई देश है लेकिन जापान की जीडीपी के आसपास भी नहीं है। जापान विकास के नाम पर एक बहुत बड़ा अपवाद है और आपने उसे पीछे किया इसका जश्न मनाइये बाकि रोने वाले वामपंथियो से तो अमेरिका जैसा देश भी परेशान है।

✍️परख सक्सेना✍️
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