प्रसिद्ध पातकी : पुरुषोत्तम के हृदय का गान है गीता
गीता ईश्वरीय वाणी है. अर्जुन का मूल प्रश्न जिस पर गीता टिकी हुई है कि कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या?
भगवान भी कोई हल्के पूरे गुरु नहीं हैं? “कृष्णं वंदे जगतगुरुम्” जो ठहरे. एक बात को इतने कोणों से समझाते हैं, कोई संभावना बच ही नहीं सकती. भाग कुतर्की मन, कहां तक भागेगा?

कर्म के पहचान की भगवान ने तमाम कसौटी दी. पर हमें यह बात सबसे अधिक पसंद आती..
1. जो कर्म प्रारंभ करते समय विष के समान लगे पर जिसका परिणाम अमृत समान हो, वह सात्विक कर्म है.
2. जो कर्म प्रारंभ करने से इंद्रियों को अमृत समान प्रतीत हो और जिसका परिणाम विष समान हो, वह मान लीजिए कि राजसिक कर्म है.
2. जिस कर्म को प्रारंभ करने से मोह एवं बंधन प्रतीत हो और जिसके परिणाम स्वरूप निद्रा आलस्य,प्रमाद मिले तो शर्तिया मान लीजिए कि वह तामसिक कर्म है.
…. है ना मजेदार बात……भगवान की यह ऐसी काल निरपेक्ष कसौटी है, जिस पर हम अपने हर कर्म का पैथॉलाजी टैस्ट कर सकते हैं. भगवान अपने प्रत्येक अवतार में सत्कर्म के लिए ही तो आते हैं. बकौल दादा भीष्म इन विष्णु सहस्रनाम: –
सद्गति: सत्कृति सत्ता सद्भुति : सत्परायण |
शूरसेनो यदुश्रेष्ठ: सन्निवास: सुयामुन: ||
भगवान की गति सज्जनों को परधि से केंद्र की ओर ले जाने वाली है. अपने मनमोहन देह की दुविधा को नेह की सांकरी गेह में उतार देने के कारण सद्गति के नाम से भी जाने जाते हैं.
जिन महाविष्णु की भृकुटि विलास से सृष्टि और प्रलय होता है, वह शबरी के झूठे बेर खाने जैसा अपनी सत्कृति के कारण भक्त के हृदयाकाश में सीध उतरते हैं. इस जगत में जो भी अच्छा हुआ या हो रहा है उसकी “सत्ता” श्रीहरि ही है, कोई अन्य नहीं.
आप भगवान् को जिस रूप में चाहो, नारायण उस भूमिका में आने के लिए तत्पर रहने के कारण “अद्भूत” हैं. सारथी की भूमिका निभा देते हैं और विराट रूप से भयभीत अर्जुन को अपना चतुर्भुज रूप दिखाकर सांत्वना भी देते हैं.भगवान को “सत् परायण” भी कहते हैं. सत्परायण का अर्थ है, जो सज्जन पुरुषों का आश्रय हो.
निश्चित जानिए ईश्वर ही नहीं ईश्वरीय वाणी अर्थात भगवद्गीता भी “सत्परायण” है. कोई जरूरी नहीं कि आप इसे भक्ति भाव से पढ़े. आप अपनी नुकीली तार्किक बुद्धि से गीता का परायण करना शुरू तो करिए..कसम से आप उनकी तार्किकता के धीरे धीरे कायल हो चलेंगे.
गीता जयंती की शुभकामनाएँ
मोक्षदा एकादशी की राम राम


