कहने को तो जिलेवासियों की समस्याओं को दूर करने के लिए, क्षेत्र के विकास को नया स्वरूप प्रदान करने के जिले के उच्चतम पद पर नियुक्त होकर लोग आते हैं लेकिन यहां की स्थानीय भाषा छत्तीसगढ़ी को अपनी दिनचर्या में प्रयोग करने से झिझकते नजर आते है।

 

छत्तीसगढ़ी बोली जिसे अब राजभाषा का दर्जा दिया गया है इसमें इतनी  सहजता और मिठास है कि यह मन को भीतर तक छू लेती है। इसमें इतनी सरलता और स्वाभाविकता है कि बोले गए बोल कानों में रस घोल जाते हैं और स्वास्थ्य लाभ के लिए जूझ रहे किसी इंसान को अगर जिले के मुखिया द्वारा छत्तीसगढ़ी बोली में संवाद किया जाए तो स्वाभाविक है कि पीड़ित की आधी समस्या ऐसे ही हल हो जाए या मरीज की आधी बीमारी बोली की मिठास से आधी हो जाए।

नवीनतम घटना जिले के विकासखंड करतला की है, जहां जिले की नवपदस्थ जिलाधीश श्रीमती रानू साहू दौरे पर थी। इस दौरान करतला के स्थानीय अस्पताल में भी निरीक्षण के लिए गईं। वहां भर्ती एक महिला मरीज  को जब छत्तीसगढ़ी भाखा में हालचाल पूछा तो महिला मरीज को वो अपनापन याद आया होगा, जो अब तक पहले कभी नही मिला।

हालांकि ये एक छोटी Vdo Clip है लेकिन इसमें  जिलाधीश श्रीमती साहू के कार्यशैली की झलक से स्पष्ट दृष्टिगत हो रहा है कि ” आम आदमी के कलेक्टर ” के रूप में उनकी छवि बनेगी।

 

Vdo में वे मरीज से छत्तीसगढ़ी में पूछ रहीं हैं – ” कोन गांव के अस ”

महिला मरीज प्रतिउत्तर में कहती है – ” जाटा”

भाषा में पिता सी गरिमा होती है लेकिन बोली में मां की ममता सा ठेठपन-अल्हड़पन समाया होता है। नवपदस्थ ज़िलाधीश श्रीमती रानू साहू की कार्यशैली बिलासपुर उच्च न्यायालय में छत्तीसगढ़ी में पारित एक आदेश की याद दिला गई है।

प्रसंगवश जब बात चली है तो आपको बता दें वर्ष 2002 में एक प्रकरण बिलासपुर उच्च न्यायालय ने पारित किया था, जिसमें ऑर्डर शीट छत्तीसगढ़ी में पारित हुआ था। इस ऑर्डर शीट में लिखा गया था –

” दिनांक 8.1.2002

आवेदिका कोति ले श्री के.के. दीक्षित अधिवक्ता,

शासन कोति ले श्री रणबीर सिंह, शास. अधिवक्ता

बहस सुने गइस।

केस डायरी ला पढ़े गेइस

आवेदिका के वकील हर बताइस के ओखर तीन ठन नान-नान लइका हावय। मामला ला देखे अऊ सुने से ऐसन लागत हावय के आवेदिका ला दू महिना बर जमानत मा छोड़ना ठीक रही।

 

ऐही पायके आदेश दे जात है के कहुँ आवेदिका ला पुलिस हर गिरफ्तार करथे तो 10000/- के अपन मुचलका अऊ ओतके के जमानतदार पुलिस अधिकारी लंग देहे ले आवेदिका ला दू महीना बर जमानत मे छोड़ देहे जाय।

आवेदिका हर ओतका दिन मा अपन स्थाई जमानत के आवेदन दे अऊ ओखर आवेदन खारिज होए ले फेर इहे दोबारा आवेदन दे सकथे।

एखर नकल ला देये जाये तुरन्त।”

– प्रकाशकीय

(प्रकाश साहू)

2 thoughts on “आम आदमी को शासन-प्रशासन से जोड़ती : जिलाधीश श्रीमती रानू साहू की कार्यशैली और वर्ष 2002 में बिलासपुर उच्च न्यायालय का छत्तीसगढ़ी में ऑर्डर शीट”

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