बालको की दहाड़ पर वनविभाग मांग सकेगा स्टे की कॉपी..? 1.22 अरब की वसूली, 28 सितंबर को सुनवाई..? ‘वीर छत्तीसगढ़’ की खबर का असर

‘’वीर छत्तीसगढ़’’ ने वनविभाग को जगाया, प्रशासन ने बालको के खिलाफ न्यायालय में दर्ज कराया प्रकरण

सालों से चल रहा था पत्रों का खेल, खबर के बाद फाइल पहुंची अदालत तक…

Veerchhattisgarh

–

ये भी पढ़ें,
बालको वनविभाग का 1.22 अरब दबाने के बाद भी दिखा रहा आंखे..अवमानना याचिका.. सरकार किसी की हो सिस्टम.. https://veerchhattisgarh.in/?p=11471
–
बालको से 1.22 अरब की वसूली..लेटर नहीं इस मैटर पर आए वनविभाग.. हाईकोर्ट अधिवक्ता अजय राजवाड़े बोले शीघ्र वसूल होगा ऐसे.. तिलस्म टूटेगा “अक्सर” का…?? https://veerchhattisgarh.in/?p=11602
–
DM के निर्देश पर गठित जांच टीम ने बालको प्रबंधन को जारी किया नोटिस.. इन बिंदुओ पर कार्यवाही की अनुशंसा… https://veerchhattisgarh.in/?p=16522
–
”बालको चिमनी दुर्घटना” भाग – 01 : लाशों के ढेर में जिंदा यक्ष प्रश्न, हादसा या व्यवस्था की चूक..? बख्शी आयोग की जांच ने भी उठाए थे सवाल https://veerchhattisgarh.in/?p=28249
–

“वीर छत्तीसगढ़” का अब सबसे बड़ा प्रश्न : क्या वसूली पर कोई स्टे है?

कोरबा। वर्षों से वनविभाग की फाइलों में घूम रहे 1 अरब 22 करोड़ 14 लाख 27 हजार 395 रुपये के मामले में आखिरकार वह हुआ, जिसका इंतजार था। ‘वीर छत्तीसगढ़’ ने सवाल उठाया, वनविभाग के पत्राचार पर सवाल खड़े किए और पूछा कि आखिर स्मरण पत्रों से कब तक रुपये की वसूली होगी?

20 मार्च 2023 और 27 मार्च 2023 को ‘वीर छत्तीसगढ़’ में वनविभाग के द्वारा वसूली करने के संदर्भ में किए जा रहे पत्राचार पर समाचार प्रकाशित किया था। जिला प्रशासन ने मामले में कार्यवाही करते हुए 23 अप्रैल 2023 को न्यायालय में प्रकरण दर्ज कराया।

यानी जिस मामले में वर्षों से पत्र पर पत्र, स्मरण पत्र पर स्मरण पत्र और कार्रवाई की चेतावनी चल रही थी, वह मामला आखिरकार न्यायालय की चौखट तक पहुंच गया, लेकिन अब इस पूरे मामले में एक और बेहद महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।

सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है या वसूली पर रोक भी है?

बालको प्रबंधन की ओर से कई बार यह बात सामने आती रही है कि संबंधित मामला माननीय सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन अथवा लंबित है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल सुप्रीम कोर्ट में किसी प्रकरण का लंबित होना ही 1 अरब 22 करोड़ रुपये की वसूली रोकने का आधार है?

या फिर इस राशि की वसूली रोकने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई स्पष्ट स्थगन आदेश, अर्थात स्टे ऑर्डर, जारी किया गया है..? दोनों स्थितियां अलग-अलग हैं।

यदि वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने इस धनराशि की वसूली पर रोक लगा रखी है, तो उस आदेश की प्रमाणित प्रति सामने होनी चाहिए। लेकिन यदि वसूली रोकने संबंधी कोई स्टे आदेश नहीं है, तो केवल यह कहना कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, अपने आप में वसूली रोकने का आदेश कैसे माना जा सकता है? यहीं वनविभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

वनविभाग बालको से मांगे स्टे की कॉपी

यदि बालको प्रबंधन वसूली की कार्रवाई के दौरान यह कहता है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो वनविभाग को उससे सीधा और स्पष्ट सवाल करना चाहिए।

क्या माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 1 अरब 22 करोड़ 14 लाख 27 हजार 395 रुपये की वसूली पर रोक लगाई है?

यदि हां, तो उस आदेश की प्रति उपलब्ध कराई जाए।

और यदि ऐसा कोई स्थगन आदेश नहीं है, तो फिर वनविभाग को बार-बार पत्राचार और स्मरण पत्रों की प्रक्रिया में उलझने के बजाय वैधानिक रूप से उपलब्ध वसूली की कार्रवाई आगे बढ़ानी चाहिए।

मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होना एक बात है और वसूली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक होना दूसरी बात।

पत्रों से नहीं निकला अरबों का पैसा, खबर ने पहुंचाया अदालत तक

वर्षों तक वनविभाग की ओर से बालको प्रबंधन को राशि जमा करने के लिए पत्र लिखे जाते रहे। कभी अंतिम चेतावनी, कभी कानूनी कार्रवाई की बात और कभी वैधानिक प्रावधानों का उल्लेख। लेकिन परिणामस्वरूप वसूली की प्रक्रिया स्थिर थी,जिसे ‘’वीर छत्तीसगढ़’’ ने बेबाकी से उठाया।

आखिर अरबों रुपये की सरकारी राशि की वसूली के लिए सिर्फ नोटिस क्यों जारी किये जा रहे हैं, अधिकारी और प्रभावी कानूनी प्रक्रिया क्यों नहीं?

खबर में यह सवाल भी उठाया गया था कि यदि वसूली के लिए वैधानिक आधार मौजूद है, तो प्रभावी कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ाई जा रही?

‘अक्सर’ वाला तिलस्म टूटा या अभी बाकी है कहानी ?

‘वीर छत्तीसगढ़’ की पिछली खबरों में एक सवाल लगातार गूंज रहा था।क्या इस बार भी वही होगा जो अक्सर होता आया है?

क्या मामला पत्राचार में उलझा रहेगा?

क्या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी कागजों में ही दब जाएगी?

या फिर इस बार वास्तव में 1.22 अरब रुपये की वसूली के लिए वनविभाग प्रशासन आगे बढ़ेगा..? कम से कम एक बड़ा पड़ाव पार हो चुका है। प्रकरण न्यायालय पहुंच चुका है।

लेकिन अब एक और सवाल का जवाब जरूरी है।

यदि बालको प्रबंधन वसूली रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के लंबित प्रकरण का हवाला देता है, तो क्या उसके पास वसूली रोकने वाला कोई स्पष्ट स्थगन आदेश है? यदि है तो आदेश सामने आना चाहिए। यदि नहीं है तो फिर कार्रवाई क्यों रुके?

वीर छत्तीसगढ़ की खबर का असर

20 मार्च 2023 व 27 मार्च 2023 को “वीर छत्तीसगढ़” ने इस मुद्दे को उठाया था और 23 अप्रैल 2023 को न्यायालय में प्रकरण दर्ज हो गया।संयोग कहें या खबर का असर, लेकिन घटनाक्रम की टाइमलाइन अपने आप बहुत कुछ कहती है।

‘’वीर छत्तीसगढ़’’ ने पूछा था कि वनविभाग लेटर पर रहेगा या मैटर पर आएगा? अब मामला लेटर से आगे बढ़कर मैटर और न्यायालय तक पहुंच चुका है।

इस संबंध में कार्यालय तहसीलदार कोरबा के द्वारा 23.02.2026 को पुनः मेसर्स भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड को 02.03.2026 प्रकरण की वर्तमान स्थिति पर चर्चा के लिए कहा गया था। सूत्रों के अनुसार इस विषय पर अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को है।

अब असली सवाल : स्टे न होने पर वसूली हो पाएगी..??

यह सवाल किसी निष्कर्ष का नहीं, बल्कि दस्तावेज का है।क्या बालको के पास इस राशि की वसूली रोकने संबंधी सुप्रीम कोर्ट का कोई आदेश है? यदि है तो वनविभाग को उसकी प्रति प्राप्त करनी चाहिए और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई करनी चाहिए।

यदि कोई स्टे नहीं है, तो फिर केवल सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने का हवाला देकर वसूली को अनिश्चितकाल तक टालना उचित प्रक्रिया है या नहीं, यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है। वनविभाग को चाहिए कि वह बालको प्रबंधन से स्पष्ट रूप से स्टे ऑर्डर की प्रति मांगे और अगर स्टे नहीं है तो वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़े।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *