सुरेंद्र किशोर : टाइम्स नाऊ-नवभारत का रिजीम चेंज पर शानदार स्टिंग ऑपरेशन
कल टाइम्स नाऊ-नवभारत ने रिजीम चेंज
पर शानदार स्ंिटग आॅपरेशन कार्यक्रम पेश किया।
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बधाई और धन्यवाद !
यह व्यापक राष्ट्रहित मंे भी है।
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खबर है कि भारत के अधिकतर टी.वी.चैनलों के दर्शक घट रहे हैं।
मुझे लगता है कि अब बड़े पैमाने पर,दिल्ली से अंचलों तक , स्ंिटग आॅपरेशन जैसे कार्यक्रम ही चैनलों को सहारा दे सकते हैं।(जरुरत लगे तो इस काम में पेशेवर जासूसों की भी मदद ली जानी चाहिए।सस्ता ही पड़ेगा।साथ ही ,टी.वी.चैनलों के संचालकों को चाहिए कि वे समाचार वाचन-डिबेट कार्यक्रमों में शालीनता लाएं।
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पिं्रट मीडिया की स्थिति भी अच्छी नहीं है।पर,प्रिंट मीडिया अब भी कुल मिलाकर चैनलों से बेहतर स्थिति में हैं।
छपे हुए शब्दों पर लोग अपेक्षाकृत अधिक भरोसा करते हैं।
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दशकों पहले मैंने कहीं पढ़ा था।
दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ का प्रसार
यानी सर्कुलेशन
बढ़ जाने का एक खास कारण रहा।
हच.टी. ने अपराध की घटनाओं का फाॅलोअप यानी पीछा करना शुरू कर दिया था।(आम तौर पर आज भी बड़ी -बड़ी घटनाओं के मात्र सप्ताह बाद उन्हें अखबार भूल जाते हैं।)
पर, अपराध की घटनाओं के मामले का फाॅलोअप करने से हच टी को प्रसार की दृष्टि से भारी लाभ हुआ था।
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दरअसल सोशल मीडिया ने परंपरागत मीडिया को फिलहाल थोड़ा उदास कर दिया है।पर मेरी समझ से यह अस्थायी फेनोमेना रहेगा।क्योंकि अधिकांश सोशल मीडिया गैर जिम्मेदार, अभियानी और असत्यवादी हैं।हालांकि सब एक जैसे नहीं हैं।
पक्ष या विपक्ष में अभियान चलाने में कोई हर्ज नहीं है।पर तथ्यों पर भी ध्यान दीजिएगा तभी साख बढ़ेगी। (सी.पी.स्काॅट–तथ्य पवित्र है,पर आप कमेंट के लिए स्वतंत्र हैं।)
टी.वी.मीडिया का एक हिस्सा खुद भी अपने पराभव के लिए जिम्मेदार है।
कारण–1.-समाचार वाचकों के न्यूज पढ़ने की गति इतनी अधिक है कि श्रोताओं को खबरों का ओर-छोर समझने के लिए अगले दिन के अखबार का इंतजार करना पड़ता है।
2.-अधिकतर टी.वी.चैनलों का डिबेट शो बिलकुल स्तरहीन और बेमतल हो गया है।आठ लोगों को एक साथ बैठा लोगे,सब या कम से कम चार एक साथ बोलेंगे और किसी का फेडर डाउन नहीं करोगे तो लोग चैनल बदलने को मजबूर होंगे ही।
कभी-कभी लगता है कि किसी चंडूखाने में बैठकर दस लोग एक दूसरे पर ही ऐसे चिल्लाते रहते हंै।उधर कुछ भाषणबाज एंकर ‘‘कुत्ता भुकाव’’ कार्यक्रम चला कर खुद खुश होता रहता है।क्या वैसे एंकर खुद अपने घर के ड्राइंग रूम में ऐसी ही असभ्य चर्चा करवाना चाहेंगे ?(याद रहे,टी.वी.सेट तो लोग अपने ड्राइंग रूम में ही रखते हैं।)
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खबरों को भोजन मानें तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया रोटी-दाल हंै।उधर सोशल मीडिया चोखा,चटनी, अचार जैसा है।
चोखा-चटनी-अचार,रोटी दाल का विकल्प नहीं बन सकता।
पर,ध्यान रहे कि रोटी ऐसे आंटे से न बनी हो जिस आंटे के पैकेट में 10 प्रतिशत उजले पत्थर को पीस कर मिलाया गया हो।
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3 नवंबर 26
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पुनश्चः
राष्ट्र द्रोह के साथ-साथ बड़े भ्रष्टाचार और गम्भीर अपराधों के मामलों व मुकदमों पर भी चैनल फाॅलो अप स्टोरी या स्टिंग आॅपरेशन चलाए।(उदाहरणार्थ–1975 में रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या हुई।वह राजनीतिक हत्या थी।अब तक मुकदमा चल रहा है।कोई चैनल ऐसी कहानी चलाए तो दर्शक बढे़ंगे।)
ं राडिया टेप कहानी ,सांसद रिश्वत स्टिंग तथा तहलका के कुछ अच्छे स्टिंग आॅपरेशन याद आते हैं।तरुण तेजपाल में बाद में भले भटकाव आ गया,पर उससे यह साबित नहीं होता है कि तरुण के सब स्टिंग आॅपरेशन गलत थे।


