इधर सप्ताह भर में नाना पाटेकर की कुछ फ़िल्में यूट्यूब पर देख ली। तिरंगा, आंच, क्रांतिवीर, शक्ति, कोहराम… इनमें से कुछ पहले भी देखी थी, पर तब शायद वह नहीं देख पाए थे जो अब दिख रहा है। ऐसा लगता है जैसे नाना के गुस्सैल अभिनय को भुनाने के लिए ही बिना सर पैर की कहानी लिखी गयी और उनसे ओवर एक्टिंग करवाया गया।

एक फिल्म है आँच। नाना उसमे एक ऐसे गाँव के मुखिया हैं जिसमें हर घर में चार चार बंदूके हैं और वे लोग जैसे मरने मारने के लिए जीते हैं। इस गाँव की पड़ोस के गाँव से दुश्मनी है और उस गाँव की स्थिति भी वही है। वहाँ का मुखिया परेश रावल भी चरित्र से ऐसा ही है। जिले के बड़े अधिकारी तो इन दोनों के नौकरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। फिल्म देखने के बाद हर आदमी सोच में पड़ जाएगा कि भारत के किस कोने में ऐसा गाँव है? कहां बसते हैं ऐसे बर्बर लोग? फिर आपको लगेगा, क्या बकवास देख रहे थे हम?
लगभग यही स्थिति है फिल्म शक्ति की। उसमें भी नाना को देख कर कहेंगे आप, “कहां बसते हैं ऐसे बर्बर लोग? यह किस देश की कहानी है?” फिर आप मानेंगे कि ये बकवास पात्र, ऐसी मूर्खतापूर्ण कहानियां केवल इसलिए लिखी गयीं ताकि नाना पाटेकर से पगलू टाइप का अभिनय करवाया जा सके, उनसे झल्लाये हुए अंदाज में डायलॉग बुलवाये जा सके…

क्रांतिवीर का जो प्रसिद्ध फांसी वाला दृश्य है, वह अब पूरी तरह बकवास लगता है। ऐसे किसकी फाँसी होती रे मेहुल कुमार?
कोहराम, हम दोनों, अब तक छप्पन, गुलामे मुस्तफ़ा, शागिर्द, एक… बाकी फिल्मों की भी यही दशा है। तब भले इन फिल्मों को दर्शक मिले हों, आज तो नहीं ही मिलते। हाँ इतना जरूर है कि नाना ने इन फिल्मों में भी अपना काम शानदार किया है, पर बिना सिर पैर की कहानी को केवल अच्छे अभिनय से नहीं चलाया जा सकता।
नाना को इधर बुढ़ापे में कुछ ठीक फ़िल्में मिली हैं, राजनीति, वेलकम, नट सम्राट, बनवास… बाकी शुरूआती दिनों में निर्देशकों ने उनका मिस्यूज ही किया है। उन फिल्मों में एक आध ही हैं जो अब पूरी देखी जा सकती हैं।


