सतीश चंद्र मिश्रा : ये कहां आ गए हैं हम… जिम्मेदार कौन है.?

ये कहां आ गए हैं हम… जिम्मेदार कौन है.?
संतुष्ट तो हूं, किंतु भीतर एक गहरी चिंता भी है।
मेरी पुस्तक ‘वरदान’ को प्रकाशन के उपरांत बिक्री के लिए उपलब्ध हुए आज 25 दिन पूर्ण हो चुके हैं। बिक्री की निरंतर गति और प्रबुद्ध पाठकों से मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से मन आश्वस्त और संतुष्ट है।
स्वाभाविक है कि अपनी कृति के प्रति उत्सुकता बनी रहती है, सो मैं भी समय-समय पर Amazon पर इसकी स्थिति का अवलोकन करता रहता हूं। इसी क्रम में Amazon पर उपलब्ध दो विशिष्ट सूचियों और उनके आंकड़ों पर दृष्टि ठिठकी, तो उन्होंने केवल चौंकाया ही नहीं, अपितु मातृभाषा हिंदी की वर्तमान दशा को लेकर मन को उद्वेलित और व्यथित भी कर दिया।


पहला आंकड़ा है Amazon की उन शीर्ष 100 पुस्तकों की सूची का, जो अपनी सर्वाधिक बिक्री के आधार पर ‘बेस्टसेलर’ की श्रेणी में दर्ज हैं। उस समग्र सूची का विश्लेषण करते हुए घोर विस्मय हुआ कि देश के इस सबसे बड़े मंच की शीर्ष 100 किताबों में हिंदी की मात्र 4 पुस्तकें ही स्थान बना पाई हैं—वे भी 48वें, 66वें, 81वें और 99वें पायदान पर। यदि इनकी प्रकृति देखें तो स्थिति और भी चिंताजनक है; 81वें स्थान पर पाकिस्तानी शायर जॉन एलिया की शायरी का हिंदी लिप्यांतरण/अनुवाद है और 99वें स्थान पर ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ भी एक विदेशी पुस्तक का अनुवाद मात्र है। 48वें क्रम पर ‘संपूर्ण गणित’ जैसी प्रतियोगी परीक्षा की पुस्तक है। एकमात्र 66वें स्थान पर दर्ज ‘मैं घोषणा करता हूं’ ही ऐसी कृति दिखी जिसे वास्तविक अर्थों में मौलिक हिंदी लेखन कहा जा सकता है।
दूसरा आंकड़ा Amazon द्वारा विषयवार किए जाने वाले वर्गीकरण का है। जब राजनीति और समसामयिक विषयों की शीर्ष 100 बेस्टसेलर किताबों की सूची को खंगाला, तो मेरी पुस्तक तो मुझे 18वें स्थान पर मिली लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी क्योंकि उस सूची में भी हिंदी की बमुश्किल 6-7 पुस्तकें ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी हैं।

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यह स्थिति तब है जब ज़मीनी हकीकत यह बताती है कि प्रतियोगी परीक्षाओं, शैक्षणिक सामग्री और सामान्य साहित्य के लगभग 55 प्रतिशत ऑफलाइन बाज़ार को पृथक कर दें, तो शेष ऑनलाइन पुस्तक बाज़ार में Amazon का एकाधिकार लगभग 65 से 70 प्रतिशत है। यानी ऑनलाइन खरीदी जाने वाली हर 10 में से 7 किताबें सीधे Amazon से पाठकों के हाथों तक पहुंचती हैं। इतने वृहद और निर्णायक मंच पर यदि हिंदी का यह हश्र है, तो इसका उत्तरदायी कौन है?
स्मरण रहे, यह आंकड़ा किसी मुफ्त पीडीएफ या ऑनलाइन सामग्री का नहीं, बल्कि उन निष्ठावान पाठकों का है जो अपनी जेब से मूल्य चुकाकर पुस्तकें खरीदते हैं। इसलिए यहां डिजिटलीकरण का तर्क देकर पल्ला झाड़ना पूरी तरह अप्रासंगिक है।
विडंबना देखिए कि जिस देश में लगभग 62 से 65 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी हो और प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाषा के रूप में हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या 80 से 83 करोड़ के विशाल आंकड़े को छूती हो, वहां बौद्धिक विमर्श और पुस्तक क्रय की यह दशा असहज करने वाली है।


इस कटु यथार्थ का दोषारोपण हम किसी व्यवस्था या मंच पर मढ़कर मुक्त नहीं हो सकते; इसका उत्तर आत्ममंथन में ही निहित है। एक समाज के रूप में हम अपनी भाषा के साहित्य को कितना सहेजते और खरीदते हैं, यह विचारणीय है। उदाहरण के लिए, मेरे निजी संग्रह में 300 से अधिक पुस्तकें हैं, जिनमें 95 प्रतिशत से अधिक कृतियां हिंदी की हैं। यदि हर सजग पाठक और लेखक अपनी भाषा के प्रति ऐसा ही अनुराग और क्रय-संस्कृति विकसित नहीं करेगा, तो यह खाई और चौड़ी होती जाएगी।

 

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