रजगामार की मासूम की मौत पर उर्मिला भगत – ”गिरफ्तारी नहीं, अंतिम न्याय तक जारी रहे संघर्ष”
जिला अधिवक्ता संघ की महिला उपाध्यक्ष बोलीं, सात साल की बच्ची के मामले में सिर्फ गिरफ्तारी को सफलता मानना उचित नहीं, न्यायिक प्रक्रिया की लगातार निगरानी जरूरी
कोरबा। जिले के रजगामार क्षेत्र में सात वर्षीय बच्ची की मौत के मामले ने समाज को झकझोर दिया है। इस घटना को लेकर जिला अधिवक्ता संघ, कोरबा की महिला उपाध्यक्ष उर्मिला भगत ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आरोपी की गिरफ्तारी को ही न्याय की पूर्णता नहीं माना जा सकता। वास्तविक न्याय तभी सुनिश्चित होगा, जब मामले की निष्पक्ष जांच हो, साक्ष्यों के आधार पर प्रभावी अभियोजन चले और न्यायालय में विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत दोष सिद्ध होने पर उचित दंड मिले।

उर्मिला भगत ने अपने वक्तव्य में कहा कि राशन दुकान जाने के लिए घर से निकली सात वर्षीय बच्ची का शव तीन दिन बाद झाड़ियों में मिलने की घटना अत्यंत पीड़ादायक है। ऐसी घटनाएं समाज की संवेदनशीलता, बच्चों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी जांच प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसे अंतिम सफलता मानकर संतुष्ट हो जाना उचित नहीं होगा।
जांच से लेकर न्यायालयीन फैसले तक बनी रहे निगरानी
उर्मिला भगत ने मामले की जांच, फॉरेंसिक रिपोर्ट, आरोपपत्र और न्यायालय में अभियोजन की प्रभावशीलता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच में उपलब्ध वैज्ञानिक एवं अन्य साक्ष्यों का समुचित संकलन हो तथा कानून के अनुरूप संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए।
उन्होंने फास्ट ट्रैक न्यायालय में सुनवाई की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए सरकारी अभियोजन की प्रभावी पैरवी और न्यायिक प्रक्रिया की नियमित निगरानी जरूरी है। उनके अनुसार, समाज को केवल गिरफ्तारी की खबर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर भी जिम्मेदारीपूर्वक नजर रखनी चाहिए।
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर सामाजिक संगठनों से भी सवाल
उर्मिला भगत ने महिला उत्पीड़न और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाली संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर और श्रमिक वर्ग के परिवारों से जुड़ी ऐसी गंभीर घटनाओं पर भी सामाजिक संगठनों को सामने आकर पीड़ित परिवार को सहयोग देना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि क्या सामाजिक सक्रियता केवल चुनिंदा घटनाओं तक सीमित रहनी चाहिए? उनके अनुसार, ग्रामीण और श्रमिक बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी समाज के किसी अन्य वर्ग के बच्चों की।
बच्चों की सुरक्षा के लिए सामुदायिक जिम्मेदारी जरूरी
उर्मिला भगत ने आम नागरिकों से अपील की कि इस घटना को कुछ दिनों की चर्चा तक सीमित न रहने दें। बच्चों की सुरक्षा के प्रति परिवारों, स्थानीय समुदायों और संबंधित संस्थाओं को अधिक सजग रहने की जरूरत है। उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने तथा बच्चों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर समन्वित प्रयास करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों की बस्तियों में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए। इसके साथ ही महिला सुरक्षा के मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
‘मासूम की मौत सिर्फ एक खबर बनकर न रह जाए’
उर्मिला भगत ने अपने संदेश में कहा कि रजगामार की बच्ची अब वापस नहीं लौट सकती, लेकिन समाज यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर सकता है कि उसकी मौत केवल एक समाचार बनकर न रह जाए। इस घटना से बच्चों की सुरक्षा, जांच की गुणवत्ता और न्यायिक प्रक्रिया की जवाबदेही को लेकर व्यापक जागरूकता पैदा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि न्याय की प्रक्रिया पूरी होने तक समाज की संवेदनशीलता और निगरानी बनी रहनी चाहिए। आरोपी के विरुद्ध कार्रवाई कानून और न्यायालय में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए तथा दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार दंड सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
उर्मिला भगत का संदेश स्पष्ट है कि गिरफ्तारी न्याय की शुरुआत है, उसका विकल्प नहीं। मासूम को न्याय दिलाने की दिशा में जांच से लेकर अंतिम न्यायिक निर्णय तक गंभीरता और जवाबदेही बनी रहनी चाहिए।


