बालको चिमनी दुर्घटना भाग-4 : क्या सेपको ने बालको से लिखित में ये मांग की थी..?
ठेका देने वाले ने क्या जांचा, ठेका लेने वाले ने क्या पूछा ?
कोरबा। 40 श्रमिकों की मौत के मामले में अब न्यायालय में अभियोजन पक्ष की गवाही शुरू, अनुबंध और सरकारी अनुमतियों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर किन दस्तावेजों में छिपे हैं ?
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कोरबा। 23 सितंबर 2009 को कोरबा स्थित भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) के 1200 मेगावाट विद्युत संयंत्र की निर्माणाधीन चिमनी ढह गई थी। इस हादसे में 40 श्रमिकों की मौत हुई। इसके बाद जांच, आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी कार्रवाई का लंबा सिलसिला चला।
इस त्रासदी से जुड़ा एक बुनियादी प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है।
क्या चिमनी निर्माण का ठेका देने से पहले आवश्यक सरकारी अनुमतियों की उपलब्धता और वैधता सुनिश्चित की गई थी? और यदि इन अनुमतियों में कोई कमी थी, तो क्या ठेका लेने वाली कंपनी ने निर्माण शुरू करने से पहले इस पर प्रश्न उठाया था?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी औद्योगिक परियोजना में केवल इंजीनियरिंग डिजाइन, निर्माण सामग्री और श्रमिकों की सुरक्षा ही मायने नहीं रखती। परियोजना का वैधानिक आधार, निर्माण स्थल की स्वीकृति और संबंधित विभागों की अनुमतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।
ठेका बालको ने दिया, निर्माण की जिम्मेदारी सेपको ने ली
बालको के विद्युत संयंत्र की निर्माण परियोजना में ठेकेदारों की एक श्रृंखला थी। बालको ने परियोजना का ठेका चीन की शानडोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (SEPCO) को दिया था। सेपको ने चिमनी निर्माण का काम गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड (GDCL) को सौंपा था।


इस प्रकार परियोजना में तीन प्रमुख पक्ष थे।बालको परियोजना की स्वामी कंपनी थी, सेपको मुख्य ठेकेदार और जीडीसीएल चिमनी निर्माण का कार्य करने वाली कंपनी थी।
न्यायमूर्ति संदीप बख्शी के नेतृत्व वाले न्यायिक जांच आयोग ने इस दुर्घटना की जांच की। दिसंबर 2012 में आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने के बाद बालको, सेपको और जीडीसीएल की भूमिका पर गंभीर प्रश्न सामने आए।
लेकिन किसी निर्माण परियोजना में जिम्मेदारी का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि किस कंपनी ने किसे ठेका दिया था। यह देखना भी आवश्यक है कि ठेका देने और ठेका लेने के अनुबंध के समय कौन-कौन सी वैधानिक शर्तें निर्धारित थीं, किन दस्तावेजों का आदान-प्रदान हुआ और निर्माण शुरू करने की अनुमति किस आधार पर दी गई।
क्या चिमनी निर्माण के लिए नगर निगम की अनुमति थी ?
यदि नगर निगम से अनुमति लेना आवश्यक था, तो क्या बालको ने संबंधित अनुमति प्राप्त की थी?
यदि अनुमति प्राप्त थी, तो उसकी प्रति सेपको को दी गई थी या नहीं?
यदि अनुमति नहीं थी अथवा उसमें कोई कमी थी, तो क्या सेपको को इसकी जानकारी थी?
और यदि नगर निगम ने निर्माण कार्य रोकने के निर्देश दिए थे, तो उन निर्देशों की जानकारी बालको, सेपको और जीडीसीएल में से किन-किन पक्षों को थी ?
क्या इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा ?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल संबंधित पत्रों, अनुबंधों और सरकारी अभिलेखों से ही मिल सकता है।
वन विभाग, राजस्व विभाग और अन्य अनुमतियों का प्रश्न
यहां एक कानूनी अंतर समझना आवश्यक है। प्रत्येक औद्योगिक परियोजना के लिए नगर निगम, वन विभाग और राजस्व विभाग से अलग-अलग अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना हर परिस्थिति में अनिवार्य नहीं होता। यह परियोजना की भूमि, भू-उपयोग, वन भूमि की स्थिति, निर्माण के स्वरूप और उस समय लागू नियमों पर निर्भर करता है।
इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि चिमनी निर्माण के लिए इन तीनों विभागों से अनिवार्य रूप से अलग-अलग एनओसी ली जानी ही थी।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन विभागों से संबंधित वैधानिक औपचारिकताओं की अनदेखी की जा सकती थी।
यदि भूमि के भू-उपयोग परिवर्तन की आवश्यकता थी, तो उसकी स्वीकृति का प्रश्न उठता है।
यदि परियोजना या निर्माण स्थल वन भूमि से संबंधित था, तो लागू वन कानूनों के तहत आवश्यक अनुमति की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
यदि स्थानीय निकाय से भवन या संरचना निर्माण की अनुमति आवश्यक थी, तो उस अनुमति का अभिलेख भी महत्वपूर्ण होगा।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक अनुमति की वास्तविक आवश्यकता, उसकी तारीख, जारी करने वाले प्राधिकारी और संबंधित कंपनी को उपलब्ध कराई गई प्रति की जांच जरूरी है।

मेरी राय में, इस मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए सरकारी दस्तावेजों, निर्माण की अनुमति, तकनीकी रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों एवं कंपनियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि जांच में किसी की लापरवाही और हादसे के बीच संबंध साबित होता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
8 मई 2025 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेश में साक्ष्यों से जुड़ी कुछ कमियां सामने आई थीं। इसलिए अब जरूरी है कि उन कमियों को दूर करने के लिए ठोस दस्तावेज और विश्वसनीय साक्ष्य जुटाए जाएं।
मेरा स्पष्ट मत है कि 40 लोगों की जान जाने के मामले में सच्चाई सामने आनी चाहिए और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन यदि कोई दोषी है, तो वह केवल जांच या साक्ष्यों की कमी के कारण जवाबदेही से बचना भी नहीं चाहिए।
– अब्दुल नफीस खान, अधिवक्ता, कोरबा
ठेका देने से पहले बालको की जिम्मेदारी क्या थी ?
किसी बड़ी औद्योगिक परियोजना में ठेका देने वाली कंपनी के सामने केवल ठेकेदार की आर्थिक क्षमता और तकनीकी योग्यता का प्रश्न नहीं होता। अनुबंध की शर्तें, कार्यक्षेत्र, वैधानिक अनुपालन और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियां भी निर्धारित करनी होती हैं।
बालको की जिम्मेदारी के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज उसका सेपको के साथ किया गया अनुबंध होगा।
क्या अनुबंध में यह स्पष्ट था कि परियोजना से संबंधित सरकारी अनुमतियां प्राप्त करने की जिम्मेदारी बालको की होगी या सेपको की ?
क्या कुछ अनुमतियां बालको को प्राप्त करनी थीं और कुछ अनुमतियां ठेकेदार को ? क्या निर्माण कार्य शुरू करने से पहले संबंधित स्वीकृतियों की जांच अनिवार्य शर्त थी ?
यदि अनुबंध में बालको को आवश्यक अनुमतियां उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई थी, तो यह देखना होगा कि उसने किन दस्तावेजों की प्रतियां सेपको को सौंपीं।
यदि वैधानिक अनुमतियां प्राप्त करने की जिम्मेदारी सेपको पर थी, तो यह भी जांचना होगा कि उसने संबंधित विभागों से दस्तावेज प्राप्त किए या बालको से लिखित रूप में उनकी मांग की।
और यदि अनुबंध में दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां अलग-अलग निर्धारित थीं, तो उन शर्तों के पालन का रिकॉर्ड भी सामने आना चाहिए।
अनुबंध की वास्तविक शर्तें देखे बिना किसी एक कंपनी को सभी अनुमतियों के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन अनुबंध की शर्तों और उनके अनुपालन की जांच किए बिना जिम्मेदारी के प्रश्न को समाप्त कर देना भी उचित नहीं है।
क्या सेपको ने बालको से लिखित लिखित में मांग की थी ?
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मुख्य ठेकेदार सेपको ने निर्माण शुरू करने से पहले आवश्यक सरकारी अनुमतियों के संबंध में क्या कदम उठाए थे?
क्या सेपको ने बालको को पत्र लिखकर नगर निगम की अनुमति, भूमि के वैधानिक उपयोग और अन्य लागू स्वीकृतियों की प्रतियां मांगी थीं ?
क्या उसने बालको से कहा था कि आवश्यक अनुमतियों की पुष्टि होने के बाद ही चिमनी निर्माण का कार्य प्रारंभ किया जाएगा ?
क्या सेपको ने जीडीसीएल को काम सौंपते समय संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित की थी ?
यदि किसी अनुमति की कमी सामने आई थी, तो क्या सेपको ने बालको को लिखित रूप में इसकी जानकारी दी थी ? क्या उसने निर्माण कार्य रोकने, स्थगित करने या आवश्यक अनुमति मिलने तक प्रतीक्षा करने का आग्रह किया था ?

-पी.एस. श्रीवास, अध्यक्ष-कारवां
इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए सेपको और बालको के बीच हुए पत्राचार, निर्माण प्रारंभ करने के निर्देश, कार्यस्थल हस्तांतरण संबंधी दस्तावेज और जीडीसीएल को जारी किए गए कार्यादेशों की जांच आवश्यक है।
अभी उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री के आधार पर यह निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता कि सेपको ने ऐसे पत्र लिखे थे या नहीं। इसलिए यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सेपको ने सभी अनुमतियां प्राप्त किए बिना ही जानबूझकर निर्माण शुरू कर दिया था।
लेकिन यदि ऐसा कोई पत्राचार मौजूद है, तो वह जिम्मेदारी निर्धारित करने में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है और इन सभी कड़ियों के बीच न्यायिक रूप से क्या संबंध स्थापित होता है, इसका उत्तर न्यायालयीन प्रक्रिया से ही सामने आना है।


