बालको चिमनी दुर्घटना भाग-3 : चिमनी गिरने से पहले क्या लिखा गया, गिरने के बाद क्या लिखा गया ? 24 पत्रों में दर्ज कहानी
बालको चिमनी हादसा : 2003 से 2011 तक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के 24 पत्र
हादसे से पहले लगातार चेतावनियां, हादसे के बाद भी जारी रहा पत्राचार
दस्तावेजों में अवैध/अप्राधिकृत भूमि विकास और संनिर्माण रोकने के निर्देश, धारा 36/37 के तहत कार्रवाई की चेतावनी
कोरबा। 23 सितंबर 2009 का बालको चिमनी हादसा आज भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। मामले की कार्यवाही जारी है। ऐसे में उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों का एक सिलसिला घटनाक्रम के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखता है।

टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की ओर से बालको को अवैध अथवा अप्राधिकृत भूमि विकास एवं संनिर्माण के संबंध में वर्ष 2003 से लगातार पत्र जारी किए गए। उपलब्ध पत्राचार के अनुसार यह सिलसिला हादसे से पहले भी चलता रहा और हादसे के बाद भी जारी रहा।
पत्रों में निर्माण अथवा भूमि विकास कार्य तत्काल रोकने तथा सक्षम प्राधिकारी से अनुमति, अनुज्ञा अथवा अनापत्ति प्राप्त करने के बाद ही कार्य किए जाने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही नियमों का पालन नहीं होने पर छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 36/37 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
हादसे से पहले के पत्र
उपलब्ध दस्तावेजों में 23 सितंबर 2009 से पहले जारी पत्रों का कालक्रम इस प्रकार है:
1. पत्र क्रमांक 1317, दिनांक 24.12.2003
2. पत्र क्रमांक 628, दिनांक 08.05.2004
3. पत्र क्रमांक 908, दिनांक 15.07.2004
4. पत्र क्रमांक 1733, दिनांक 02.11.2004
5. पत्र क्रमांक 1863, दिनांक 27.11.2004
6. पत्र क्रमांक 122, दिनांक 22.01.2005
7. पत्र क्रमांक 307, दिनांक 11.02.2005
8. पत्र क्रमांक 266, दिनांक 03.03.2006
9. पत्र क्रमांक 645, दिनांक 04.08.2006
10. पत्र क्रमांक 1626, दिनांक 08.11.2006
11. पत्र क्रमांक 794, दिनांक 23.06.2007
12. पत्र क्रमांक 657, दिनांक 12.06.2008
13. पत्र क्रमांक 230, दिनांक 02.07.2008
14. पत्र क्रमांक 1240, दिनांक 24.10.2008
15. पत्र क्रमांक 489, दिनांक 05.06.2009
16. पत्र क्रमांक 546, दिनांक 17.06.2009
यानी उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार हादसे से पहले कम से कम 16 पत्र जारी किए जा चुके थे।
इन पत्रों की विषयवस्तु में अवैध अथवा अप्राधिकृत भूमि विकास और संनिर्माण रोकने, सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेने तथा नियमों का पालन करने संबंधी निर्देश शामिल थे।
23 सितंबर 2009 के हादसे के बाद भी नहीं थमा पत्राचार
23 सितंबर 2009 को बालको में चिमनी हादसा हुआ। इसके बाद भी उपलब्ध रिकॉर्ड में विभागीय पत्राचार जारी रहने की बात सामने आती है।
हादसे के बाद उपलब्ध पत्र हैं:
17. पत्र क्रमांक 950, दिनांक 14.10.2009
18. पत्र क्रमांक 269, दिनांक 18.03.2010
19. पत्र क्रमांक 390, दिनांक 23.04.2010
20. पत्र क्रमांक 364, दिनांक 24.02.2011
21. पत्र क्रमांक 980, दिनांक 05.08.2011
22. पत्र क्रमांक 1017, दिनांक 28.08.2011
23. पत्र क्रमांक 1091, दिनांक 08.09.2011
24. पत्र क्रमांक 1407, दिनांक 30.11.2011
इस प्रकार उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार हादसे के बाद भी कम से कम 8 पत्र जारी हुए और पत्राचार नवंबर 2011 तक चलता रहा।
एक पत्र में क्या कहा गया था?
उपलब्ध पत्र में विभाग ने पूर्व में जारी किए गए अनेक पत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित पक्ष को अवैध अथवा अप्राधिकृत भूमि विकास और संनिर्माण तत्काल बंद करने तथा सक्षम प्राधिकारी से अनुमति, अनुज्ञा अथवा अनापत्ति प्राप्त करने के बाद ही कार्य करने के लिए निर्देशित किया गया था।
पत्र में यह भी दर्ज है कि पूर्व में भेजे गए पत्रों और सूचना पत्रों के बावजूद भूमि विकास और संनिर्माण का कार्य जारी रहा।
इसके बाद संबंधित पक्ष को किए गए अवैध अथवा अप्राधिकृत भूमि विकास और संनिर्माण को तत्काल हटाकर स्थल को पूर्व स्थिति में लाने के लिए कहा गया तथा ऐसा नहीं करने की स्थिति में धारा 36/37 के तहत कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी गई।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
यहां एक बात स्पष्ट रूप से रेखांकित करना जरूरी है कि इन पत्रों को जारी करने वाले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग को इस प्रकरण में आरोपी बनाया गया है, ऐसा उपलब्ध जानकारी से सामने नहीं आता।
इसलिए इन पत्रों के आधार पर विभाग अथवा उसके अधिकारियों के संबंध में कोई आरोप या निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, ये पत्र सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और घटनाक्रम की समयरेखा समझने में महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकते हैं। इनका न्यायिक महत्व क्या है, संबंधित पक्ष ने इन निर्देशों का कितना पालन किया और इन पत्रों में दर्ज परिस्थितियों का 23 सितंबर 2009 की दुर्घटना से कोई न्यायिक संबंध बनता है या नहीं, इसका निर्धारण लंबित न्यायिक कार्यवाही में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायालय के समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।
सवाल पत्रों से हैं, फैसला न्यायालय का
2003 से शुरू हुआ पत्राचार 2009 के हादसे से पहले तक लगातार चलता रहा। हादसे के बाद भी विभाग की ओर से पत्र जारी होते रहे और यह सिलसिला नवंबर 2011 तक पहुंचा।
इस पूरे दस्तावेजी क्रम को देखते हुए सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन पत्रों में दर्ज आपत्तियों और निर्देशों के बाद वास्तविक स्तर पर क्या कार्रवाई हुई? संबंधित पक्ष की ओर से क्या जवाब दिया गया? किन निर्देशों का पालन हुआ और किनका नहीं?
लेकिन इन सवालों का अंतिम उत्तर किसी समाचार की टिप्पणी से नहीं, बल्कि संबंधित दस्तावेजों, साक्ष्यों और न्यायालयीन कार्यवाही से ही सामने आएगा।
फाइलों में दर्ज तारीखें अपनी जगह हैं। पत्रों में दर्ज निर्देश अपनी जगह हैं। हादसा अपनी जगह है। अब इन सभी कड़ियों के बीच न्यायिक रूप से क्या संबंध स्थापित होता है, इसका उत्तर न्यायालयीन प्रक्रिया से ही सामने आना है।


