अमित सिंघल : 14 मामलों में अलग राय, मगर फैसला क्या था? चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे प्रश्न का उत्तर

Split Decision भी निर्णय है: चुनाव आयुक्तों की अलग राय को अनियमितता मानना कितना तार्किक?
असहमति दर्ज होना व्यवस्था की कमजोरी नहीं, निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता भी हो सकती है

किसी भी सरकार एवं अंतर्राष्टीय संगठनों की कार्यपद्धति में निर्णय लेने की प्रक्रिया बहुआयामी होती है।

Veerchhattisgarh

किसी भी जटिल विषय से डील करने के लिए या तो ऊपर से प्रस्ताव आता है कि इस विषय पर कार्यवाई करने के लिए ऑप्शन या विकल्प प्रस्तुत करिए। या फिर नीचे से प्रस्ताव जा सकता है कि ऐसा विषय चिंताजनक हो सकता है और इस पर कार्यवाई करने के लिए कुछ विकल्प आपके निर्णय के लिए प्रस्तुत है।

जब प्रस्ताव या फाइल व्यवस्था में मूव करती है तो उसमे विभिन्न स्तर पर लोग अपनी राय देते है, पिछली राय के विरोध या समर्थन में लिखते है, या अधिक जानकारी मांग लेते है।

उदाहरण के लिए, पिछले माह एक राष्ट्र में अचानक एक जटिल समस्या से जूझना पड़ गया था। दो परस्पर विरोधी विचार सामने रखे गए। एक विचार के फेवर में अधिक लोग थे। अतः निर्णय लिया गया कि विधि विभाग से सलाह ली जाए। जब सलाह मिल गयी, तो वह अल्पमत वाले विचार के फेवर में थी; अतः निर्णय ले लिया गया। कुछ लोगो को वह निर्णय विवादास्पद लगा था। लेकिन उस निर्णय पर आगे बढ़ गए।

अब कोई उन दो परस्पर विरोधी विचारो के आधार पर कह सकता है विभाग में मतभेद था, निर्णय नहीं लेना चाहिए था।

मैं कार्यालय में दो पैनल का सदस्य था या हूँ। दोनों तीन-सदस्यीय पैनल।

एक में भर्ती की रिकमेन्डेशन को जांचना होता था कि उस भर्ती का प्रोसेस नियमानुसार किया गया है या नहीं। इस पैनल में अगर एक भी सदस्य नकारात्मक व्यू देता है, तो भर्ती का पूरा प्रोसेस निरस्त हो जाता था। एक भर्ती के प्रोसेस पर मैंने असहमति व्यक्त करी थी; अन्य लोगो ने मुझसे अपनी टिप्पणी पर पुनर्विचार करने के लिए कहा। पुनर्विचार के बाद भी मैं अपनी राय पर स्थापित था। अतः, चयनित कैंडिडेट की भर्ती कैंसिल करनी पड़ी।

अब किसी पत्रकार को उसका डॉक्यूमेंटेशन मिल जाए तो वह लिखेगी कि भर्ती में फ्रॉड हुआ था; पैनल में एकमत नहीं था; पैनल के एक सदस्य पर दबाव डाला गया था। लेकिन ऐसी पूरी प्रक्रिया में कोई फ्राड या अनियमितता नहीं थी; यह निर्णय लेने की एक स्थापित व्यवस्था थी।

दूसरा पैनल स्टाफ के कार्य की वार्षिक समीक्षा के सम्बन्ध में नकारात्मक रेटिंग को रिव्यु करता है। एक केस में लगभग 30 घंटे लग जाते है। सम्बंधित स्टाफ एक लिस्ट में से स्वयं तीन सदस्यों को चुनता है। इस पैनल में मैं मैनेजमेंट का प्रतिनिधि हूँ। इसमें नियम है कि निर्णय बहुमत से लिया जाएगा, अर्थात सभी तीन सदस्य एकमत होंगे या फिर दो सदस्य किसी निष्कर्ष का अनुमोदन करेंगे, जबकि तीसरा सदस्य विरोध में है। दोनों विचारो को रिकॉर्ड किया जाएगा और बहुमत का निर्णय मान्य होगा। इस split decision (विभाजित निर्णय) पर भी कोई प्रश्न उठा सकता है। मैनेजमेंट अपने फेवर में; स्टाफ अपने फेवर में। लेकिन यही प्रक्रिया है।

अब इंडियन एक्सप्रेस की चुनाव आयोग के बारे में रिपोर्ट को एक अन्य एंगल से देखने का आग्रह करूँगा – और वह है इंडियन एक्सप्रेस के एंगल से।

जब पत्रकार ने रिपोर्ट लिखी होगी तब उसके सम्पादको ने पत्रकार से कुछ बिन्दुओ पर स्पष्टीकरण माँगा होगा; अधिक जानकारी की मांग की होगी; कुछ निष्कर्षो से असहमति जताई होगी। उसकी रिपोर्ट को एडिट किया होगा।

क्या इन सभी एडिट्स, स्पष्टीकरण, जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि इंडियन एक्सप्रेस में इस रिपोर्ट के लेकर मतभेद था और इसे प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए था?

अगर चुनाव आयोग के एंगल से देखे, तो दस माह में लिए गए दर्ज़नो निर्णय में से 14 में चुनाव आयुक्तों के मध्य फाइल पर विभिन्न व्यूज थे। अगर फॉर्म 6 को लेकर अलग विचार थे, तो निश्चित रूप से क़ानूनी सलाह ली गयी होगी। वह सलाह क्या थी, इस पर इंडियन एक्सप्रेस चुप है। फिर जब फाइनल निर्णय लिया गया, तो क्या वह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था, या फिर split decision था? और अगर split decision था तो क्या उसके फेवर में दो सदस्य थे या नहीं?

अगर एक आयुक्त के विचारो के आधार पर निर्णय लिया गया था, जबकि दो अन्य विरोध में थे, तभी आप अनियमितता प्रूव कर सकते है।

अगर 14 विषयो पर चुनाव आयुक्तों के मध्य फाइल पर विभिन्न व्यूज थे, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया पर आप अनावश्यक शोर मचा रहे है। फाइनल निर्णय क्या था, कैसे लिया गया – यह महत्वपूर्ण है।

यहाँ तक कि उच्च न्यायालयों के निर्णय भी split decision से निकलते है और मान्य होते है। क्या ऐसे split decision को आप अनियमितता कह सकते है?

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