सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ : रामकथा.. बख्श दीजिए
बहुत पहले विविध भारती पर महान फिल्म संगीतकार रवि साहब का एक इंटरव्यू सुना था, जिसमें उन्होंने बताया था कि पुराने सभी संगीतकार पहले गीतकारों से गीत लेते थे और फिर उसके हिसाब से धुन बनाते थे। रवि साहब भी सदैव ऐसा ही करते रहे। जिन्हें पुराने फिल्म संगीत में रुचि है, वे जानते हैं कि रवि साहब का नाम कितना बड़ा है।

नीलकमल, खानदान, चौदहवीं का चांद, वक्त, गुमराह, हमराज, निकाह, आँखें और ऐसी ही अनेक फिल्मों के गीत अब भी लोगों के दिमाग पर छाए हुए हैं।
अभी नए दौर के संगीतकारों में शायद ही कोई हो जो किसी गीतकार से छंदबद्ध गीत लिखवा कर धुन बनाता हो। वे धुन बना लेते हैं, फिर गीतकार उस धुन में शब्द फिट करता है। अब इस तरह से गीत बनें तो वैसे ही बनेंगे जैसे रामायण में बने हैं।

अब तक जो दो गीत रिलीज हुए हैं, उन्हें पढ़िए तो लगेगा कि यह तुकबंदी पांचवीं कक्षा के बच्चों लायक भी नहीं है। कुछ जगह तो शब्दों की जलेबी से कोई अर्थ ही नहीं निकलता। पर इसके लिए आप केवल गीतकार को दोष नहीं दे सकते। धुन के हिसाब से लिखना एक बड़े बंधन में बंध कर लिखना होता है।
रामकथा पर बनी पुरानी फिल्मों, धारावाहिकों के गीत हों या अन्य फिल्मों के लिए लिखी गई प्रार्थनाएं हों, वहां कविताई हृदय छू लेती है। साहिर लुधियानवी का मेरे रोम रोम में बसने वाले राम, शकील बदायूंनी का मन तड़पत हरि दर्शन को आज, मजरूह सुल्तानपुरी का कान्हा आन पड़ी मैं तेरे द्वार या जावेद अख्तर का ही युगांधर वाला भजन… इन सभी गीतों की पंक्तियां मन मोह लेती हैं।
सामान्यतः दूरदर्शन वाले सीरियल्स रामायण या महाभारत के गीतों पर हम बात नहीं करते, पर इन दोनों के गीत अद्भुत थे। महाभारत में एक प्रेम गीत है, “प्रणय के प्रथम प्रहर की बात…” अर्जुन और सुभद्रा के ऊपर फिल्माया गया यह गीत सबसे मोहक प्रेम गीतों में है। या देवी रुक्मिणी का पत्र पढ़ने भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर “बिनती सुनिए नाथ हमारी…” गीत। आप सुनें तो घंटे भर तक इसके जादू से बंधे रहते हैं। रामायण सीरियल में ही लव कुश वाला वह लंबा गीत, “हम कथा सुनाते राम सकल गुण धाम की…” अकेले ही काफी है रविन्द्र जैन जी को अमर कर देने के लिए… फिर चार हजार करोड़ खर्च कर के बनाई गई फिल्म की यह गति?
कभी कभी लगता है, ये फिल्म वाले रामकथा को बख्श ही दें तो बेहतर… अब ये चाहें भी तो कुछ अच्छा नहीं कर पाते। लव स्टोरी, एक्सन, सस्पेंस आदि बनावो यार… सिनेमा इंडस्ट्री में स्थापित कवियों की अनावश्यक ही प्रतिष्ठा खा रहे हैं ये सब…


