अमित सिंघल : आंदोलन..? “प्रदर्शनकारी” की केवल डेड बॉडी की प्रतीक्षा में गिद्ध
फ्रांस वाली हिंसा भारत में क्यों नहीं फ़ैल पायी है?
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मैंने भारत में हिंसा के द्वारा मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के प्रयास के बारे में पहला लेख 18 दिसंबर 2018 में लिखा था। लेख का शीर्षक था: “कांग्रेस का भारत में “अरब स्प्रिंग” फैलाने का सपना टूट गया।”
चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष की आशा के विपरीत 2019 के चुनाव में अधिक मतों और सीट से चुनकर वापस आ गए हैं तो विपक्ष की समझ में नहीं आ रहा कि अब अगले पांच वर्ष कैसे निकाले जाए। इसलिए उन्होंने विरोध और प्रदर्शन के द्वारा प्रधानमंत्री की वैधता पर चोट करने का प्रयास शुरू कर किया है। और इस टूलकिट की प्रेरणा उन्हें “अरब स्प्रिंग” से मिली जिसमे कई देशों में आम नागरिकों के प्रदर्शन और हिंसा के कारण कई सरकारों ने रिजाइन कर दिया या फिर उन देशों में सरकारों की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लग गया था।
इस रणनीति की शुरुवात पहली जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव में दलित हिंसा को जानबूझकर भड़का कर की गयी। तदोपरांत, SC/ST एक्ट में कोर्ट से निर्णय करवा कर दलितों में अशांति और स्वर्णो का मोदी सरकार से मोहभंग करवाने का प्रयास किया गया।
एक अन्य ट्रैक के अंतर्गत संवैधानिक संस्थाओ की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पे प्रश्नचिन्ह लगवाना था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को उनके ही मुख्य न्यायाधीश के विरूद्ध प्रेस कांफ्रेंस करवाना, चुनाव प्रक्रिया, चुनाव आयोग, CAG, सीबीआई (जिसके निदेशकों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट का भी रोल होता है) इत्यादि पे संदेह जताना था। इसी प्रकार, जस्टिस लोया की हृदयगति से निधन को षड्यंत्र बताना, जबकि हार्ट अटैक के समय उनके साथ दो सहयोगी जज उपस्थित थे।
कारण यह था कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें। अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया। ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जानबूझकर कर की गयी थी, ना कि नासमझी में। उनका पूरा ध्यान अपने आप को, अपना NGO और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था।
तभी सुज़ाना अरुंधति रॉय ने दिसंबर 2019 में कहा था कि वे लोग अगले चार वर्ष तक प्रतिदिन प्रदर्शन नहीं कर सकते. “इनके खिलाफ हम चार साल रोज़ नहीं लड़ सकते न..इनको चार साल देना नहीं चाहिए….”
यही बात अब अशांत प्रदूषण एवं काक्रोच कह रहे है कि उनके हिंसक प्रदर्शन का लक्ष्य रेजीम चेंज (regime change) है।
अतः अभिजात वर्ग पिछले लगभग 9 वर्ष से प्रधानमंत्री मोदी से निपटने के लिए झूठ, छल, कपट एवं हिंसा का सहारा ले रहा है।
लेकिन आशातीत “सफलता” नहीं मिलने के बाद इन लोगो ने इन लोगो ने किशोर-नवयुवा, विशेषकर किशोरियों एवं नवयुवतियों को एक शस्त्र के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया है। अंग्रेजी में इसके लिए एक विशेष शब्द है: weaponisation। इस बारे में विस्तार से इस वर्ष 2 अगस्त को लिखा था। इस हिंसा को भड़काने के लिए अभिजात वर्ग (इसमें इटैलियन माफिया भी शामिल है), अलगाववादी तत्वों, कट्टरपंथियों, नक्सलियों, घुसपैठियों और अपराधियों का उपयोग कर रहा है।
फिर भी फ्रांस तथा अन्य यूरोपियन राष्ट्रों में पिछले कई सप्ताह से चल रही हिंसा के सन्दर्भ में एक प्रश्न उठता है कि भारत में इन नक्सलियों द्वारा व्यापक स्तर पर हिंसा फ़ैलाने का प्रयास क्यों नहीं सफल हो पाया है?
स्पष्ट उत्तर है: मोदी सरकार सजग है। उसे पता है कि अर्बन नक्सल किसी भी एक “प्रदर्शनकारी” की केवल डेड बॉडी की प्रतीक्षा में गिद्ध की तरह आस लगाए हुए है।
प्रमाण स्वतंत्रता दिवस के मोदी जी के सम्बोधन में मिलता है जब उन्होंने नशा मुक्त भारत (गृह मंत्री ने ड्रग्स के कारोबार के पूरे इकोसिस्टम पर प्रहार करने के बारे में बोला है), तथा दिमागी नक्सल की बारे में चेतावनी दी थी जो हिंसा अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं।

फिर, प्रधानमंत्री मोदी व्यापक जनता के मध्य वास्तविक रूप से लोकप्रिय है जो निरंतर 70 प्रतिशत के ऊपर चल रही है। उनकी सरकार एवं सत्ता का आधार नैतिक है।
कांग्रेसियों एवं अर्बन नक्सल ने मोदी जी को “अनपढ़”, चायवाला, टेलीप्राम्प्टर से भाषण पढ़ने वाला, सही उच्चारण से अंग्रेजी ना बोलना वाला कहकर उन्हें अपमानित करने का प्रयास अवश्य किया और कर रहे है, लेकिन ऐसे विशेषणों ने एक विशाल जनमानस में मोदी जी को एक मिटटी से जुड़े व्यक्ति के रूप में प्रोजेक्ट किया है।
मोदी जी के विपरीत फ्रेंच राष्ट्रपति माक्रों की लोकप्रियता इस समय केवल 15 प्रतिशत है और उन्हें फ्रांस के अत्यधिक अभिजात्य वर्ग का सदस्य माना जाता है।
मोदी सरकार तथा अन्य भारतीय संस्थाए मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सेकुलरिज्म एवं भारतीय झंडे का weaponisation नहीं होने दे रही है। जबकि यूरोप इस weaponisation का शिकार स्वयं हो गया है। वही weapon या अस्त्र जिसका “अन्वेषण” यूरोप ने अपने उपनिवेशों को कण्ट्रोल में करने के लिए किया था।


