परख सक्सेना : ..इसीलिए अमेरिका को अंबानी की शरण मे आना पड़ा
फ़्रांस का संकट सभी लोग गलत समझ रहे है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ मे शीत युद्ध शुरू हुआ ये सबको पता है लेकिन सोवियत से असली शत्रुता यूरोप को थी। यूरोप को डर था कि कम्युनिस्ट कॉकरोच कही उनके देश मे गंदगी ना फैला दे।
यूरोप मे इंडस्ट्री बर्बाद थी, विश्वयुद्ध की मार सबसे ज्यादा गरीब ने सहन की थी।
कम्युनिस्टो के लिए यूरोप की धरती उपजाऊ थी, इसीलिए नाटो का गठन हुआ कि कम से कम सोवियत संघ के सीधे हमले को तो टाला जाए। इसमें वे सफल रहे मगर समस्या ये थी कि यूरोप मे कम्युनिस्ट नेता पैदा हो रहे थे।

इसमें कोई शक नहीं कि यूरोपीय देशो ने अर्थव्यवस्था पर अच्छा काम किया क्योंकि अमेरिका से पैसे भरपूर मिल रहे थे। लेकिन इस बात का ध्यान रखा कि साधारण जनता दुखी ना हो जाये वरना कम्युनिस्म का खतरा होता।
इसलिए फ्रीबीज शुरू हुआ, स्कूल फ्री, ऊर्जा फ्री, इंफ्रास्ट्रक्चर फ्री और परिवहन फ्री। फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी अच्छी चली, आबादी कम थी पैसो की कमी नहीं थी।
आपको हिन्दू तीर्थस्थलों मे कितने ही फ्रांसीसी दिख जाएंगे जिनके पास नौकरी नहीं है मगर सरकार की पेंशन पर वो भारत घूम रहे है।
फ़्रांस एक विकसित देश है और विकसित देशो की जीडीपी ग्रोथ बहुत ज्यादा नहीं होती क्योंकि गुंजाईश कम है। भारत मे हम महंगाई दर 2-6% रखते है, फ़्रांस मे ये उच्चतम 3 ही होती है। अब स्थिति ये है कि ग्रोथ कम है और महंगाई दर भी इतनी कम कि एक युद्ध हो जाये तो इकोसिस्टम हिला दे।
यही संकट 2022 से शुरू हुआ रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और अमेरिका ने रूस से तेल सप्लाय काट दी। सिर्फ भारत और चीन नहीं झुके बाकि पूरी दुनिया अमेरिका के आगे झुकी, ऊर्जा संकट महंगाई लाया लेकिन यूरोप इसे जैसे तैसे झेल गया।
असली समस्या आयी ज़ब अमेरिका ने ईरान पर आक्रमण किया, होर्मूज संकट ने यूरोप की कमर तोड़ दी।
फ़्रांस का वो आदमी जो मुफ्त की तोड़ने का आदि हो रहा था वो देख रहा है कि अब मजा नहीं रहा। ग्रोथ हो नहीं रही ऊपर से महंगाई खाये जा रही है।
2026 मे ये प्रेशर कूकर फट गया, ये ही मूल भावना इस आंदोलन की जड़ है और इसलिए फ़्रांस जल रहा है। 2018 मे भारत सरकार पर भी दबाव था कि कच्चा तेल सस्ता है तो पेट्रोल सस्ता कर दो, लेकिन भाव घटाने का मतलब डिमांड बढ़ाना होता है।
भारत ने वो समय तेल रिजर्व बनाने मे प्रयोग किया और इसीलिए अमेरिका को अंबानी की शरण मे आना पड़ा हम अमेरिका की शरण मे नहीं गए। ये मानता हूँ कि भारत कोई परफेक्ट देश नहीं है, हमें बहुत काम करने की जरूरत है।
लेकिन दुनिया मे सिर्फ 4 देश है जो संप्रभु है और किसी पर निर्भर नहीं है। अमेरिका, भारत, रूस और चीन। दुनिया मे चल रहे युद्ध हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते है लेकिन ध्वस्त नहीं कर सकते।
इन चार मे से भी सिर्फ अमेरिका और भारत है जिनके डेटा सार्वजनिक है, बाकि दो तो दबाकर बैठे है।
इसलिए मुस्कुराइए आप भारत मे है, बाकि नैरेटिव प्रोपोगंडा और करोचो के खिलाफ तो हमें लड़ना ही है। विदेशी टुकड़ों पर पल रहे नौकरो की क्या हैसियत है।
मुझे नहीं पता कि हमारी सड़के फ़्रांस जैसी कब बनेगी, हम हैप्पीनेस इंडेक्स मे कैसे आगे आएंगे या हमारे लोगो मे सिविक सेन्स कब आएगा लेकिन ये गारंटी है कि फ़्रांस की तरह हम घुटनो पर नहीं होंगे।
ये ऋषि मुनियो की तपोभूमि है, हम गिरेंगे लेकिन पूरा बाउंस बेक करेंगे। हम बेबीलोन, रोमन या ब्रिटिश साम्राज्य की तरह बिखरेंगे नहीं, अपनी गति से बढ़ेंगे ठंडा करके खाएंगे और अभी नहीं तो कभी जग सिर मोर जरूर बनेंगे।
✍️परख सक्सेना✍️
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-आंशिक संशोधित।


