प्रसिद्ध पातकी : “बहुत नीला शंख जैसा भोर का नभ”
“बहुत नीला शंख जैसा भोर का नभ”
भगवान विष्णु के पांच आयुध बताये जाते हैं. ये आयुध हैं..शंख, चक्र, गदा, तलवार और धनुष. अब भगवान का मामला है तो इनके अपने स्वतंत्र नाम भी हैं. शंख पाञ्चजन्य या पांचजन्य, चक्र सुदर्शन, गदा कौमोदकी, तलवार नंदकी या नंदक और धनुष शार्ङ्ग या शारंग. आप यह सब तो जानते ही हैं. पर बात बस इतनी ही हो, ऐसा नहीं हैं.

पंचायुधों में से आज हम जरा शंख पर विचार करते हैं. हमारे गुरु जी पूज्य स्वामी वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर जी महाराज ने एक बड़ी रोचक बात भागवत कथा में बतायी थी. उसे याद कर आज भी बरबस मुस्कुराहट आ जाती है. वे बोले भगवान नारायण माता लक्ष्मी को खुश रखने की कोई युति नहीं छोड़ते. अब उन्होंने अपने बाएं तरफ भगवती भार्गवी को बैठा रखा है तो बाएं हाथ में शंख भी धारण कर रखा है. दोनों भाई बहन एक संग रहेंगे तो खुश रहेंगे. भगवान से घड़ी- घड़ी झंझट नहीं करेंगे. माता लक्ष्मी और शंख, दोनों समुद्र से उत्पन्न होने से भाई-बहन का रिश्ता रखते हैं.

पर विष्णु सहस्त्रनाम सुनाने के अंतिम चरण में भीष्म दादा कहते हैं, वनमाली भगवान वासुदेव अपनी गदा,शारंग,शंख,चक्र और नंदकी से हमारी रक्षा करें.
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी .
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु
अब सोचने वाली बात है कि बकिया चार आयुध तो ठीक किंतु यह भगवान के “साले बाबू” शंख महाराज हमारी रक्षा भला कैसे कर सकते है? बचपन से यह बात सुनते आ रहे हैं कि शंख बजाने से वातावरण के सूक्ष्म कीटाणु मर जाते हैं.
पश्चिमी चिंतक भारतीय मनीषा पर एक आरोप लगाते है कि भारतीय मनीषा ” रिपीटेटिव” है. एक बार जो सिद्ध हो चुका, उसे बार बार सिद्ध करेंगे. मिसाल के तौर पर वैदिक विद्वान जब तक रज्जु और सांप का उदाहरण नहीं देते, उनकी बात पूरी नहीं होती. खैर, मैं कहां दर्शन के मरुस्थल में उतर पड़ा.
कोरोना की पहली लहर की चपेट में आकर मैं 16 दिन दो अस्पताल में रहा. पहले सरकारी और फिर प्राइवेट. जमराज के अस्थाई ठिकाने अस्पताल से डिस्चार्ज होने के समय, उन्होंने मुझे एक प्लास्टिक का खिलौना पकड़ा दिया. और बिल में साढ़े सात सौ रुपये जोड़ दिये. मैं अड़ गया और उसे लेने से इकांर कर दिया. अस्पताल वाले बोले, ले जाइये, ये फेफड़ों की एक्सरसाइज करवाएगा. पर मुझे उनकी बात ना माननी थी, ना मैंने मानी
पर यह क्या? घर आया तो वह खिलौना मुझसे पहले घर पहुंच गया था. अस्पताल वालों के झांसे में आकर छोटे भाई साहब उसे उठाकर ले आए. मैंने उसे ट्राई किया. नली वाली सारी गेंदे आसनी से ऊपर चढ़ गयीं. इसमें मेरी कोई पहलवानी ना थी. सारी करामात संध्या के समय नियमित किए जाने वाले प्रणायाम के अभ्यास की जो थी.
अब आते हैं सबसे जरूरी बात पर. क्या आपने गौर किया है कि आजकल मौसम बदलते ही आपके आसपास बहुत लोग यह शिकायत करते हैं कि बार-बार गले का इंफेक्शन हो रहा. यह सामान्य से अधिक समय तक खिंच रहा. ऐसा क्यों हो रहा है, इसका कारण भी कोई गुप्त नहीं है. कोरोना ने हम सभी के फेफड़ों और श्वसन तंत्र को थोड़ा या ज्यादा, नुकसान पहुंचाया है. पहले भी ऋतु परिवर्तन पर जुखाम होता था पर जल्द ठीक हो जाता था.
तो राजन, भगवान के आयुध की शरण जाओ. रोज शंख फूंको. सूक्ष्म कीटाणु मरे ना मरे, आपके श्वसन तंत्र और फेफड़ों की कसरत नियमित रूप से होती रहेगी. भगवान की युति पर चल कर “साले बाबू” की पूछ-परख करोगे तो माता लक्ष्मी भी आपके घर पर कृपा कटाक्ष को सहर्ष रखेंगी..
अब ज्योतिष में शंख की कुछ चर्चा हो जाए. नवम भाव कुंडली का सबसे महत्वपूर्ण भाव है. यह भाग्य का भाव होता है. इससे पिता, गुरु, उच्च शिक्षा, दूर देश की यात्रा आदि को देखते हैं. यदि आपको लगता है कि आपका भाग्य आपका साथ नहीं दे रहा तो आप भगवान विष्णु या उनके किसी भी अवतार/स्वरूप के मंदिर में शंख दान कर दीजिए. यदि आपकी लग्न वायुतत्व राशि है, यथा मिथुन, तुला और कुंभ तो ऐसा शंख दान करिए, जो फूंककर बजाया जाता हो. यदि जलतत्त्व राशि वाली लग्न हो यथा कर्क, वृश्चिक और मीन तो ऐसा शंख विष्णु मंदिर में दान करिए जिसमें गंगाजल भरकर श्रीहरि के समक्ष रखा जाता है. शेष अग्नि तत्त्व राशि के लग्न वाले यथा मेष, सिंह एवं धनु तथा पृथ्वी तत्त्व राशि यथा वृष, कन्या एवं आकर लग्न वाले कोई भी शंख उत्साह के साथ श्रीहरि को समर्पित कर सकते हैं.
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह: |
सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्
ध्यान रखिए, जीवन “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्र ” के रूपक वाला एक संग्राम ही है. इसमें प्रथम शंखनाद नारायण या गुरु नहीं करते. पहला शंखनाद भक्त ही करेगा. जी हां, भक्तराज दादा भीष्म की तरह . फिर जाकर पीछे से, भगवान कृष्ण के पांचजन्य का तुमुल घोष होगा.
एकादशी की राम राम


