परख सक्सेना : फ्लॉप मुद्दे फ्लॉप रैलियों के मायने क्या हैं..?

बात 1850 की है लाल किले से कुछ दूर एक तालाब था ये सूख गया, अंग्रेजो ने इस पर बस्ती बनाने की मना कर दी तो मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर ने रामलीला आयोजित करवाई।

बादशाह जिद पर अड़ गया कि रावण का वध वो करेगा, लेकिन ये नहीं हुआ। ध्यान रहे उस समय तब्लीगी जमात नहीं थी इसलिए मुसलमान हिन्दू त्यौहार को धर्म से ज्यादा संस्कृति से जोड़कर देखते थे और अधिकांश शामिल ही होते थे।

Veerchhattisgarh

खैर इस मैदान पर रामलीला हर साल होने लगी और यह रामलीला मैदान कहलाया। अंग्रेजो ने इस पर रोक भी लगाई तो मदन मोहन मालवीय ने इसे कानूनी लड़ाई लड़कर फिर से हासिल किया। तब से आज तक यहाँ रामलीला कभी नहीं रुकी।

ये मैदान जिन्ना का भी गवाह बना, क्वीन एलिजाबेथ के आगमन पर नेहरू ने उनका सत्कार यही किया था। लेकिन ये मैदान कांग्रेस के लिए हमेशा घाटे का सौदा रहा, इंदिरा के खिलाफ जेपी आंदोलन हो या बीजेपी के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कश्मीर आंदोलन, या फिर अन्ना हजारे की रैली।

कांग्रेस हर बार बेकफुट पर रही, इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। पहली बार कांग्रेस आक्रमक हुई, लेकिन खाली पड़ी कुर्सियां बहुत कुछ दर्शाती है। तुम 29 राज्य की अलग अलग पार्टियों को लेकर आये हो, पहले बोला 10 लाख लोग आएंगे फिर गिनती गिरकर सीधे 50 हजार पर कर दी।

इस मैदान की कैपेसिटी 35 हजार की है उसमे भी कुर्सियां खाली पड़ी है। सवाल वो नहीं है सवाल ये है कि 29 राज्यों से औसत तुम 2 हजार लोग ही लेकर आये? एक पार्टी के 5 हजार भी गिनो तो 1.5 लाख तो बस कार्यकर्ता हो जाने चाहिए थे।

स्थिति साफ है कि ये फ्लॉप शो है, तमाशा देखने कुछ गए हो तो गए हो। यही कारण है कि भारत मे क्रांति नहीं होती, भारत सक्रांति का देश है। यहाँ ज़ब भी रिजिम चेंज की बात होती है तो जनता खुद उपद्रवियो के सामने खडे हो जाती है।

बीजेपी की दृष्टि से देखा जाए तो भारत मे जीवंत मुद्दों पर आयी पार्टी कभी सत्ता से नहीं जाती। जनता ने महंगाई, बेरोजगारी, मुस्लिम तुष्टिकरण और गरीबी से बचने के लिए बीजेपी को चुना था। इसलिए इन सारे मुद्दों पर वो कांग्रेस के पास कभी नहीं जायेगी भले ही बीजेपी खून क्यों ना पी जाये।

ये बहुत दूर का खेल है और 2024 ही वो लक्ष्मण रेखा थी जो बीजेपी फान गयी। 24 मे रोक लेते तो रोक लेते, नीतीश नायडू को तोड़ लेते तो तोड़ लेते लेकिन हर तरफ से देर हुई। 99 सीटों पर बेहूदा नाच किया, ममता और उद्धव की पार्टियां ताश के पत्तों की तरह बिखरी और नीतीश नायडू वाली जोड़ का विकल्प बन गयी।

बीजेपी अब अपनी गलती से ही जायेगी और इससे पहले UGC वालो के मुँह मे पानी आये। ये वो गलती नहीं है, मैं बड़ी गलतियों की बात कर रहा हूँ जो ऐतिहासिक हो। मानो भारत पाकिस्तान कब्जा ले और बीजेपी पाकिस्तानियों पर नरमी दिखा दे।

ऐसे मे एक गुट खड़ा होकर विरोध करेगा, ये एक बेसिक उदाहरण है। बीजेपी इस लेवल की उपलब्धि पाने के बाद जो गलती करेगी उसकी बात कर रहा हूँ।

फ्लॉप नेताओं की फ्लॉप रैलिया दर्शाती है कि राजनीति अब बदल चुकी है, मुद्दे अब भविष्य को ध्यान मे रखकर तय होंगे ना कि अतीत को।

✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *