सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ : जमुई कांड ; लड़की के कपड़े, बॉयफ्रेंड और बहाने.. मगर उस भीड़ का क्या जो अपराधियों को ‘शेर’ बनाती है ?
जमुई कांड में एक अपराधी के पैर में गोली मारी गई है। दूसरे का पैर टूटा है। इनके अलावे तीन और गिरफ्तार हुए हैं शायद… देर से ही सही, कानून अपना काम कर रहा है। पर क्या इतना ही आवश्यक है?
बात इस विषय पर भी होनी चाहिए कि अपराधियों में इतना आत्मविश्वास कहां से आ रहा है? “लड़की के कपड़े ठीक नहीं थे, वह ब्वॉयफ्रेंड के साथ थी, वे गलत हरकत कर रहे थे”, ऐसी बातों के आधार पर किसी मवाली को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह उसके साथ ऐसी अभद्रता करे… पर उन अपराधियों ने इसे अपना अधिकार माना है। यह ’पावर’ कहां से आता होगा?

गांव देहात में पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं। यदि कोई लड़का लड़की इस तरह अकेले में मिलें तो उनके साथ मारपीट की घटनाएं होती रही हैं। सामान्यतः लड़के को पीट देते हैं लोग… पर लड़की के साथ सरेआम इस तरह की बदतमीजी पहले नहीं सुनी गई कभी। यह कोई सुनसान जगह में घटी घटना नहीं है, वहां लोग थे। फिर भीड़ के सामने सरेआम किसी लड़की को इस तरह उठा लेने का साहस कहां से आ रहा है?
उत्तर तनिक कड़वा है, पर सच यही है कि जातीय गोलबंदी ही ऐसे अपराधियों की असली ताकत है। इसमें किसी एक जाति को आप कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते, लगभग सबकी एक ही दशा है। हर जाति, हर वर्ग की अपनी सोशल मीडियाई फौज है, जो अपनी जाति के अपराधियों के साथ खड़ी मिलती है। उसके गुनाहों को ढकने का प्रयास तो होता ही है, बल्कि उन्हें अपनी जाति का शेर बताया जाता है।
ऑर्केस्ट्रा, अश्लील भोजपुरी फिल्मों, और जातिवादी गीतों के साथ बड़ी हुई यह फौज निहायत ही अभद्र है, फूहड़ है। आप एक घटना देख कर सिर्फ उन्हीं चंद अपराधियों की बात कर रहे हैं, पर अवसर मिलने पर सभी वही करेंगे। ऐसों की संख्या अब हजार में नहीं, लाख में होगी। यह भीड़ बढ़ती जा रही है…
हर जाति की ताकत और बल के गीत बने हैं, और बेरोजगार लड़के उन गीतों पर रील बना कर खुद को शेर बताते हैं। वे कहीं गलत करते हुए पकड़े जाएं तो उनके जैसे सैकड़ों लोग तुरंत साथ आ जाते हैं। उस भीड़ के सामने आप प्रशासनिक अधिकारियों की दशा देख लें तो लगेगा कि ऐसी नौकरी से बेहतर है ठेला लगा कर मूंगफली बेच लेना…
अभी कल ही एक रील देख रहा था जिसमें एक युवक किसी थाना इंचार्ज को अभद्र तरीके से डांटते हुए ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे वह अधिकारी ही अपराधी हो। वह इकलौता नहीं है, ऐसे सैकड़ों हैं, हजारों हैं… ये दस की संख्या में हों तो वे ही पुलिस होते हैं, वे ही जज… कानून उनके पीछे दुम हिलाता है।
क्या सरकारें इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास कर रही हैं? उत्तर आप जानते हैं। ऐसे में कानून बहुत कुछ कर नहीं सकता। सुनने में बुरा लगेगा, पर सच यही है। कुछ महीनों में जब वे लड़के जेल से छूट कर निकलेंगे तो उनका स्वागत होगा… रीले बनेंगी, नारे लगेंगे…
अपने कमरे में बैठ कर बौद्धिकता बघार रहे फर्जी स्त्रीवादी हों, या सब सुधार देने के दावे करने वाले राजनेता हों, इनके ऊपर भरोसा कर के सुनसान इलाकों में जाने वालों के साथ कभी भी ऐसा हो सकता है। आप अपनी सुरक्षा के जिम्मेवार खुद हैं… कहने में बुरा लग रहा है, पर यही सत्य है।


