भूपेंद्र सिंग : जाति.. एजेंडा चलाने वाले एजेंडा चलाना बंद नहीं करेंगे लेकिन…

जातीय युद्ध की धमकी देने वाले अथवा उससे आगाह करने वालों को यदि कहा जाये कि सड़क पर उतरकर इसके खिलाफ एक प्रदर्शन करो, तो दो तीन घंटे में ये गर्मी और उमस से बेहाल होकर घर चले जाएंगे। घर जाने से पहले का महत्वपूर्ण स्टेप ये है कि ये उसके पहले प्रदर्शन के लिए घर से बाहर निकलें।
वैसे पिछले दो दशक में भारत में जातीय आधार पर एक भी बड़ी घटना नहीं घटी है। कोई एक भी ऐसी घटना नहीं घटी है जिसे नरसंहार, दंगा इत्यादि कहा जा सके। जातीय आधारित किसी आर्मी अथवा सेना ने जमीन पर आपस में एक दूसरे के खिलाफ एक भी हिंसात्मक भिड़ंत नहीं की है। जो लोग भी सड़क पर उतरे हैं वह दूसरे पर संवैधानिक हथियार से हमला करने का दबाव बनाने के लिए उतरे हैं यानी सामने वाले पर FIR हो, जेल भेजा जाये, यानी अंत में मामला कोर्ट के माध्यम से ही हल करने का दबाव बनाया गया है।
इस देश में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव अब शिष्टाचार का हिस्सा नहीं हैं, जहां कहीं है भी उसके पक्ष में अब लोगों को तर्क देने की हिम्मत नहीं है। हां, लोग उसे झुठला रहे हैं परंतु उसको स्वीकार करके उसका पक्ष लेना समाप्त हो चुका है। गांवों में व्यवस्था अभी भी दिख रही है लेकिन वह अब शोषण के अतिरेक पर नहीं है, वह ढीली पड़ रही है।
जहाँ आप जातीय भिड़ंत देखते हैं, वह वास्तव में 99% मामलों में जाति के कारण नहीं होता। झगड़ा होगा जमीन के लिए, नाली के लिए, सड़क निकास के लिए परंतु यदि दोनों पक्ष अलग अलग जाति से हैं तो विवाद के उपरांत वह झगड़ा जमीन, नाली और सड़क से आगे बढ़कर जातियों का बन जाता है। जो लोग यह फैला रहे हैं कि भारत में जातिवाद बढ़ रहा है, वह या तो झूठ बोल रहे हैं अथवा एजेंडे के शिकार हैं। दो जाति के दो लोगों के बीच लड़ाई होगी किसी और मामले में और जाति आधारित राजनीति करने वाले नेता और संगठन उसे दो व्यक्तियों से दो जातियों का झगड़ा बताते हैं।
डेढ़ अरब आबादी का यह देश है यहां यदि रोज 10 करोड़ में एक व्यक्ति भी थोड़ी गड़बड़ी करे तो रोज 15 मसाला न्यूज तैयार हो जाता है, बाबजूद इसके लोगों को जाति आधारित नरसंहार, दंगा, भिड़ंत बताने गिनाने के लिए शून्य है।
कभी कोई सेना सड़क पर उतरती है, कभी कोई आर्मी, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं बची है जो ये कहे कि हम कानून को नहीं मानेंगे, संविधान को नहीं मानेंगे और सड़क पर फैसला करेंगे। सभी की मांग पुलिस और सरकार से ही होती है और अंतिम निर्णय कोर्ट में होता है।
हालांकि मेरे लिखने से एजेंडा चलाने वाले एजेंडा चलाना बंद नहीं करेंगे लेकिन बावजूद इसके यह सत्य अटल रहेगा कि इतने विस्तृत, विशाल और विविधतापूर्ण देश में पिछले दो दशक से एक भी जातीय नरसंहार नहीं हुआ है और हमारा समाज इतनी तेजी से और सकारात्मक रूप से बदल रहा है कि इसके होने की संभावना भी शून्य होती जा रही है।

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