अमित सिंघल : मोदी विरोध की पटकथा.. पहले छवि पर वार, अब दलित एजेंडे का हथियार! अवार्ड वापसी से गाली-गलौज तक..
आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की स्वच्छ इमेज और लोकप्रियता से निपटने के लिए राहुल-समर्थको की दो-ध्रुवी रणनीति घिनौनी, लेकिन स्पष्ट है।
प्रथम, किसी भी तरह प्रधानमंत्री मोदी की स्वच्छ, लोकप्रिय इमेज और उनकी नेकनीयत को ”नष्ट” और ”चकनाचूर” कर दो। यह राहुल ने स्वयं कई बार स्वीकार किया है।
द्वितीय, बड़े पैमाने पे दलितों के नाम पर नक्सली एवं जातिवादी हिंसा करवा कर मोदी सरकार को पंगु और असहाय बना दिया जाए।
पहली रणनीति का प्रारम्भ अवार्ड वापसी, असहिष्णुता का ठप्पा, वैश्विक रैंकिंग में भारत को नीचे गिरवाना (कांग्रेस के समय भी ऐसी रैंकिंग नीचे ही थी), रफाल, “चौकीदार चोर है”, जस्टिस लोया, अडानी-अम्बानी, इत्यादि से किया गया था। और अब भद्दे कॉमेडियन के कुत्सित जोक एवं कुछ छात्र-छात्राओं की अत्यधिक घृणित गाली में परिवर्तित हो गया है। इसके पीछे विचार यह है कि जो उद्देश्य अवार्ड वापसी, असहिष्णुता, रैंकिंग, भ्रष्टाचार के आरोप से नहीं प्राप्त हो पाया, कदाचित वह शर्मनाक गाली-गलौज से पूरा हो जाए।
दूसरी रणनीति की शुरुवात पहली जनवरी 2018 में भीमा-कोरेगांव में दलित हिंसा को जानबूझकर भड़का कर की गयी थी। तदोपरांत, SC/ST एक्ट में कोर्ट से निर्णय करवा कर दलितों में अशांति और स्वर्णो का मोदी सरकार से मोहभंग करवाने का प्रयास किया गया था। इसे फर्जी किसान आंदोलन, CAA-विरोधी आंदोलन, दिल्ली में दंगा, नॉएडा में उद्यमियों के विरूद्ध तोड़-फोड़ और संवैधानिक संस्थाओ में डर बिठाकर जारी रखा गया। इस सन्दर्भ में कई और भड़काऊ घटनाक्रम हुए है जिसका उल्लेख नहीं कर रहा हूँ।
इसी कड़ी में राहुल-समर्थको ने दलित-एजेंडा का weaponisation या शस्त्रीकरण कर दिया है। अर्थात, कोई भी दलित-सम्बन्धी विषय हो, उसकी गहराई, तथ्यों में ना जाकर, उसे युद्ध के शस्त्र की तरह प्रयोग करके मोदी सरकार पर वार कर दो।
इसके पीछे सोच यह है कि किसी भी दल को बहुमत से सरकार बनाने के लिए 37 प्रतिशत वोट जीतना होगा। यह बड़ी रेखा स्वयं भाजपा ने खींच दी है; नहीं तो उसके पहले देव गौड़ा, गुजराल, अटल जी एवं सोनिया केवल 22 से 28 प्रतिशत वोट शेयर से सरकार बना रहे थे।
या फिर भाजपा का वोट शेयर 37 प्रतिशत से कम करके 32-33 प्रतिशत पर ला दो; जो इस समय राहुल-समर्थको की रणनीति है। इन्हे आशा है कि यह 4-5 प्रतिशत वोट राहुल-समर्थको दलों को मिल जाएंगे और वह खिचड़ी सरकार बना ले जाएगा।
अब समस्या यह है कि दलित एवं अल्पसंख्यक समाज एक वोट बैंक के रूप में मतदान करता है। अगर दोनों समाज चुनाव में अलग-अलग मार्ग चुनते तो समस्या नहीं थी। लेकिन भाजपा को अल्पसंख्यक समाज का वोट नहीं मिलता है और जिसके लगभग 80 प्रतिशत मतदाता वोट डालते है जो चुनाव में कुल मतदान का लगभग 23 से 25 प्रतिशत बैठेगा।
दूसरे शब्दों में, किसी भी चुनाव में अल्पसंख्यक समाज के उच्च मतदान के कारण भाजपा को कुल पड़े वोट के 75 प्रतिशत से बहुमत लाना होता है।
एक साधारण गणित से इसे समझाने का प्रयास करता हूँ।
मानिए कि भारत में कुल वोट पड़े: 100
इनमे से भाजपा को वोट लेना है: 75 मतों से।
अब 100 मत से 37 वोट जीतना तुलनात्मक रूप से आसान हो सकता है।
लेकिन 75 में से 37 वोट जीतने के लिए भाजपा को इन 75 वोट से 50 प्रतिशत शेयर जीतना होगा।
अब अगर इन 75 वोट में से दलित मतदाता भी छिटक जाए, तो भाजपा को केवल 60-62 वोट में से 37 वोट खीचना होगा जो लगभग 61 प्रतिशत शेयर होता है।
सर्विदित है कि यूपी-बिहार के अधिकतर यदुवंशियों का भी वोट नहीं मिलना है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में भाजपा की उपस्थिति कम है। ब्राह्मण समाज या फिर अन्य सामान्य वर्ग एक वोट बैंक के रूप में मतदान नहीं करता है। सामान्य वर्ग के वोटर 45-50 प्रतिशत मतदान करते हैं।
अतः, चुनाव में भाजपा को लगभग 50 वोट में से 37 वोट खींचना होगा है जो लगभग 75 प्रतिशत बैठेगा जो एक असंभव कार्य है। कारण यह है कि सामान्य वर्ग अमेठी, रायबरेली, सीतापुर एवं अन्य कई चुनाव क्षेत्रो में राहुल-समर्थको को वोट देता है। वह भी राम मंदिर एवं 370 के बाद।
तभी भाजपा को सुनिश्चित करना होता है कि उसका वोट शेयर व्यापक हो। और इसके लिए भाजपा को दलित-वनवासी-OBC समाज का 60 प्रतिशत वोट जीतने का लक्ष्य रखना होता है।
लेकिन यही तथ्य राहुल-समर्थको को भी पता है। तभी दलित-एजेंडा का weaponisation या शस्त्रीकरण किया जा रहा है। अगर बचे-खुचे भाजपा समर्थक दलित-एजेंडा से भड़क कर वोट देने नहीं निकलते है या नोटा दबा देंगे, तो राहुल-समर्थको का सत्ता पाने का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
संभव है कि मेरे आंकड़े गलत हो। अगर आप के पास सही आंकड़े है तो लेख को संशोधित कर लूँगा।


