अमित सिंघल : मास्टर साहेब को परिणाम पता है

70 के दशक के अंत में सुल्तानपुर के पंत स्टेडियम के पास किराये के घर में रहते थे। अतः स्टेडियम में होने वाले किसी भी टूर्नामेंट को देखने पहुंच जाते थे। किसी क्रिकेट के मैच में बिशन सिंह बेदी भी आये थे और कुछ ओवर फेंके थे। बेदी जी के साथ मेरी एक फोटो भी है। टेबल टेनिस के टूर्नामेंट इंडोर होते थे। कुछेक में टिकट से एंट्री मिलती थी, लेकिन बच्चा लोग स्टेडियम की दीवार में लगी सेंध से रेंग कर फ्री में घुस जाते थे।

एक बार कुश्ती का टूर्नामेंट हुआ जिसमे मास्टर चन्दगी राम भी आये थे। उनके भाग लेने का भारी प्रचार हुआ था क्योकि उन्हें एशियाड खेल में कुश्ती के लिए स्वर्ण पदक मिला था। हम बच्चो में भी भारी उत्साह था और उस इवेंट में टिकट लगा होने के बाद भी फ्री में कुश्ती देखने के लिए सेंध से अंदर घुस गए थे। दाए-बांए करते हुए किसी तरह VIP दीर्घा एवं आयोजकों के निकट वाले घेरे में नीचे बैठ गए थे।

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कई पहलवान कुश्ती खेल चुके थे। मास्टर जी वहीं आयोजकों के मध्य बैठे थे। कुछ घंटे बीत गए थे लेकिन मास्टर चन्दगी राम अखाड़े में नहीं उतरे थे। जनता बैचेन हो रही थी और मास्टर जी की कुश्ती देखने के लिए चिल्ला रही थी।

अंत में, मास्टर चन्दगी राम लंगोट पहनकर अखाड़े में घुसे और कुछ चक्कर काटे। अपनी मांसपेशिया फड़काई। आयोजक ने वहां बैठे पहलवानो को मास्टर साहेब से कुश्ती लड़ने के लिए ललकारा। इनाम की भी घोषणा की। लेकिन कोई भी पहलवान अखाड़े में नहीं आ रहा था। मास्टर साहेब अखाड़े में हुंकार भर रहे थे।

कई बार की घोषणा के बाद एक पहलवान हिम्मत करके मास्टर साहेब से कुश्ती लड़ने के लिए अखाड़े में प्रवेश कर गया।

तालियों एवं सीटियों से स्टेडियम गूँज उठा। हम भी उत्साहित थे कि अब “मजा” आएगा।

लेकिन यह क्या? मास्टर साहेब में उस “पहलवान” को तिरस्कार की दृष्टि से देखा और कुश्ती लड़ने से मना कर दिया।

स्टेडियम में शांति छा गयी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। नर्वस आयोजक अखाड़े में मास्टर साहेब के पास गए और उनके बीच कुछ खुस-पुस हुई।
दर्शक दम साधे बैठे थे।

फिर आयोजकों ने घोषणा की कि मास्टर साहेब कह रहे है कि पहले वह पहलवान उनके शिष्य को कुश्ती में हरा दे। उसके बाद ही वे उस पहलवान से कुश्ती लड़ेंगे।

फिर मास्टर साहेब का शिष्य अखाड़े में उतरा और उस पहलवान को कुछ ही सेकंड में पहले ही दांव में चित्त कर दिया।

मास्टर साहेब वहीं अखाड़े के बाहर खड़े थे; चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उस पहलवान की हार एवं शिष्य की जीत से परे थे।

स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था। मास्टर साहेब ने अपनी श्रेष्ठता एवं बड़प्पन बिना लड़े ही स्थापित कर दिया था।

अब राहुल पहलवान मास्टर नरेंद्र मोदी को पुनः डिबेट की चुनौती दे रहे हैं।

पहले राहुल पहलवान मास्टर साहेब के शिष्य निशिकांत दुबे से तो दो-दो हाथ कर ले। पहलवान दुबे ने आलरेडी कांग्रेस के अखाड़े में कुश्ती लड़ने की चुनौती स्वीकार कर ली है।

मास्टर साहेब को परिणाम पता है। इस समय उनके चेहरे पर तिरस्कार का भाव है।

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