सर्वेश्वर तिवारी “श्रीमुख” : वोटर लिस्ट से सच में नाम कटे होते तो पंचायत कार्यालयों पर धुंआ बरस रहा होता… लेकिन…

एक तरफ समूचे विपक्षी दल और उनके समर्थक बिहार के वोटर लिस्ट से कटे नामों को लेकर आंदोलित हैं, दूसरी ओर बिहार के किसी भी गाँव में बीएलओ के पास दो आदमी पूछने नहीं गए हैं कि मेरा नाम क्यों कट गया। आंदोलन फेसबुक पर है, सदन में है, यहाँ तक कि सभाओं और सड़कों पर भी। बस नाम जोड़ने और काटने वाले कर्मी के पास नहीं है। सोचिये न, आखिर क्यों?
ऐसा इसलिए है, क्योंकि सचमुच जेनुइन वोटर्स के नाम कटे ही नहीं हैं। सम्भव है कि एक आध गलतियां हुई हों, पर वह संख्या एक आध ही होगी। बहुत ही कम… काम आदमी ही कर रहे हैं, तो एक आध गलतियां भी होंगी ही।
बिहार का विपक्ष बहुत कमजोर नहीं है। सत्ता पक्ष से थोड़े ही कम विधायक हैं उनके। हर बूथ पर उनके सामर्थ्यवान कार्यकर्ता हैं, वोटर हैं। और यह भी सत्य है कि उतने आक्रामक कार्यकर्ता अन्य किसी दल के नहीं हैं। यदि सचमुच नाम कटे होते तो अबतक पंचायत कार्यालयों पर धुंआ बरस रहा होता… लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है।
अब आप पूछेंगे कि नाम कटे किसके हैं, तो सुनिये। चुनाव आयोग के पास अपने कर्मी नहीं होते हैं। आज ही नहीं, कभी नहीं रहे। उनके लिए शिक्षक काम करते हैं, वह भी शिक्षण कार्य के बाद। जब चुनाव आयोग उन्हें अतिरिक्त कार्य सौंपता है तो वे चुनाव कार्य करते हैं, अन्यथा शिक्षण कार्य करते हैं। सरकार किसी की भी रहे, चुनाव आयोग का काम ऐसे ही होता है। ऐसे में मृत लोगों के नाम तुरंत नहीं कट पाते, और वर्षों तक नाम चलता रहता है। इसी तरह लड़कियों का ब्याह होने के बाद उनका नाम ससुराल में भी जुड़ जाता है, और मायके में भी चलता रहता है। भूल चूक से कुछ लोगों का नाम डबल भी हो जाता है। ऐसे में यदि चुनाव आयोग पाँच वर्ष पर भी नाम काटने का अभियान चलाए, तबतक काटने लायक नामों की संख्या 5 से 10 प्रतिशत तक चली जाती है।
अब आप कह सकते हैं कि ऐसे में तो बड़ी गड़बड़ होती होगी, मरे लोगों का वोट पड़ जाता होगा, फर्जी वोट बहुत पड़ते होंगे, ब्ला ब्ला… तो ऐसा नहीं है। लोकसभा चुनावों में साठ पैंसठ प्रतिशत से अधिक वोट नहीं पड़ते। कहीं कहीं तो पचास पचपन तक भी… वास्तविक मतदाताओं का पूरा वोट तो पड़ता नहीं, मरे हुओं का कौन गिरायेगा?
चुनावकर्मी के रूप में कार्य करने वाले लोग जानते हैं कि किसी पोलिंग बूथ पर दस बीस फर्जी वोट भी पड़ जाय तो कितना बड़ा बवाल खड़ा हो जाता है। भाई साहब, बिहार के नब्बे प्रतिशत पोलिंग बूथ की स्थिति ऐसी होती है कि जरा सी गड़बड़ी दो मिनट में सरफुटौवल करा दे… दोनों पक्ष तने रहते हैं दिन भर… चुनाव कर्मियों के यहाँ मनौती मांगी जाती है कि बाबू चुनाव करा के ठीक ठीक लौट आएं तो मिठाई चढ़ाएंगे ए देवता… ऐसे में कोई कह रहा हो कि आज के समय में बड़े पैमाने पर फर्जी वोट गिरते हैं, तो मान लीजिये कि वह पप्पू ही है…
नाम कटे लोगों की लिस्ट आज हर पोलिंग बूथ पर कारण सहित चिपका दी गयी है। हर गाँव का व्यक्ति देख सकता है, बल्कि कर्मी बुला बुला कर दिखा भी रहे हैं। कहीं कोई दिक्कत नहीं है। वैसे एक प्राइवेट बात बता देते हैं। चुपके से, कान मे… फिलहाल नाम जोड़ने काटने में लगे कर्मियों में अधिकांश सरकार के विरोधी और विपक्ष के कट्टर समर्थक हैं। किसी को बताइयेगा मत…
फर्जी मुद्दों से फेसबुक ट्विटर पर तो हल्ला हो सकता है, पर इससे ग्राउंड की स्थिति नहीं बदलती… बेहतर होता कि विपक्ष सही मुद्दों पर बात करता। मुद्दे कम नहीं हैं, न दिख रहे हों तीसरा पक्ष बन रहे उस नए दल के नेता के कुछ वीडियो देख लीजिये, मुद्दे दिखने लगेंगे।

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