”बालको चिमनी दुर्घटना” भाग-02 : 40 बुझी जिंदगियों की स्मृति में श्रद्धांजलि का सन्नाटा.. स्मारक की आवश्यकता
कोरबा। 23 सितंबर 2009 को कोरबा की धरती ने वह मंजर देखा था, जिसे शायद शब्दों में पूरी तरह बयान करना संभव नहीं। एक निर्माणाधीन चिमनी भरभराकर गिरी और उसके साथ न जाने कितने परिवारों के सपने भी मलबे में दब गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 40 श्रमिकों की मौत हुई और सात लोग घायल हुए।
चिमनी निर्माण का काम बालको के पावर प्लांट प्रोजेक्ट से जुड़ा था। परियोजना में बालको, सेपको, जीडीसीएल की भूमिकाएं थीं। हादसे के बाद राज्य सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और पुलिस ने मामला दर्ज किया।फिर आया बख्शी न्यायिक जांच आयोग। आयोग को यह जांचना था कि दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार था, निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए गए थे या नहीं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए।
बाद में सार्वजनिक हुई रिपोर्ट के बारे में प्रकाशित विवरणों में कहा गया कि निर्माण, गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़े नियमों के पालन में गंभीर कमियां थीं। रिपोर्ट में बालको, सेपको और जीडीसीएल के साथ तत्कालीन नगर निगम, नगर एवं ग्राम निवेश तथा श्रम विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे।यहीं से यह घटना महज एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं रह जाती। यह व्यवस्था के चरित्र का सवाल बन जाती है, क्योंकि किसी मजदूर की जिंदगी केवल इसलिए सस्ती नहीं हो सकती कि वह किसी ठेकेदार के अधीन काम करता था। किसी निर्माणाधीन ढांचे की ऊंचाई जितनी बढ़ती है, उसके साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़नी चाहिए।
और यदि कहीं सुरक्षा से समझौता हुआ था, गुणवत्ता की अनदेखी हुई थी, निरीक्षण केवल कागजों पर हुआ था या जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई थी, तो सवाल केवल उस दिन के हादसे का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जिसने हादसे की जमीन तैयार की।बालको की वह चिमनी 23 सितंबर 2009 को गिरी थी लेकिन उसके मलबे से निकला सबसे बड़ा सवाल आज भी खड़ा है।।हादसा था..? व्यवस्था की चूक थी..?..या सुरक्षा से किए गए किसी समझौते की कीमत 40 जिंदगियों ने चुकाई थी?.इन सवालों का अंतिम उत्तर न्यायिक प्रक्रिया से ही आएगा।
स्मृति में एक दीप भी नहीं..
सबसे पीड़ादायक विडंबना शायद यह है कि जिन श्रमिकों के नाम पर श्रमिक संगठन अपनी आवाज बुलंद करते हैं, उन्हीं श्रमिकों की स्मृति में 23 सितंबर को एक दीप जलाने की पहल भी दिखाई नहीं देती। यह सब थम सा गया है। जिन 40 श्रमिकों ने उस भयावह हादसे में अपनी जान गंवाई, वे किसी एक संगठन के सदस्य नहीं थे, वे श्रम की उस दुनिया के प्रतिनिधि थे जिसके अधिकारों और सुरक्षा की बात करने वाले अनेक मंच आज मौजूद हैं। फिर भी उनकी बरसी पर सामूहिक स्मरण का एक दीप तक न जलना हमारे समय की संवेदनहीनता पर सवाल खड़ा करता है।
स्थायी स्मारक बनाया जाना चाहिए
बालको चिमनी हादसे के मृत श्रमिकों की स्मृति में एक स्थायी स्मारक बनाया जाना चाहिए। ऐसा स्मारक केवल पत्थर की कोई इमारत न हो, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी और स्मृति का वह दीप बने, जो कहे कि विकास की हर ऊंचाई के नीचे श्रमिक का पसीना और जीवन जुड़ा है। वहां उन 40 श्रमिकों के नाम अंकित हों, ताकि औद्योगिक विकास की चमक के बीच उनकी स्मृति कहीं ओझल न हो जाए। स्मारक केवल मृतकों का सम्मान नहीं होगा, बल्कि जीवित व्यवस्था के लिए एक मौन शपथ होगा कि श्रमिक की सुरक्षा किसी परियोजना की लागत नहीं, उसकी पहली शर्त है।
प्रबंधन की स्मृति भी सवालों के घेरे में
यह भी याद नहीं पड़ता कि हादसे के इतने वर्षों बाद प्रबंधन की ओर से कभी उन दिवंगत श्रमिकों की स्मृति में कोई उल्लेखनीय सार्वजनिक आयोजन किया गया हो। समय की धूल बहुत कुछ ढक देती है, लेकिन 23 सितंबर जैसी तारीखें इतिहास की धूल में दब जाने के लिए नहीं होतीं। जिन श्रमिकों के श्रम और जीवन से किसी औद्योगिक परियोजना की नींव जुड़ी थी, उनकी स्मृति में प्रति वर्ष एक श्रद्धांजलि सभा, स्मृति दिवस या कोई स्थायी आयोजन क्या बहुत बड़ी अपेक्षा है?
औद्योगिक संस्थान केवल मशीनों, संयंत्रों और उत्पादन के आंकड़ों से नहीं बनते। उनकी आत्मा उन हाथों में होती है, जो जोखिम उठाकर उन्हें आकार देते हैं। इसलिए उन हाथों की स्मृति को जीवित रखना केवल संवेदना नहीं, संस्थागत जिम्मेदारी और मानवीय कर्तव्य भी होना चाहिए। हर 23 सितंबर को यदि संयंत्र परिसर में उन 40 श्रमिकों के नाम लेकर एक दीप जलाया जाए, तो वह दीप केवल मृतकों की स्मृति में नहीं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के श्रमिकों की सुरक्षा के संकल्प के रूप में भी जलेगा।


