सर्वेश तिवारी श्रीमुख : जाइए आप कहां जाएंगे…
आशा जी की यात्रा पूरी हो गई। बयानबे की आयु जाने की ही आयु होती है, और इस तरह जाने को ही बुजुर्गों ने “पूरा हो जाना” कहा होगा। दस वर्ष की आयु से शुरू हुई यात्रा में उन्हें संगीत प्रेमियों से जो प्रेम मिलना शुरू हुआ वह जीवन भर मिलता रहा। वे एक दिन के लिए भी चर्चा से बाहर नहीं हुईं, एक दिन भी लोग उन्हें भूले नहीं, एक कलाकार को जीवन से और क्या चाहिए? 
आशा जी को पांच पीढ़ियों ने सुना है और उनके साथ झूमे हैं। उन्होंने जब पहला गीत रिकॉर्ड किया तब दस साल की थीं और जब अंतिम गीत रिकॉर्ड किया तब इक्यानवे की। मतलब इक्यासी वर्ष लंबा कैरियर… इतना लंबा तो अधिकांश जन का जीवन भी नहीं होता।
ईश्वर ने उन भाई बहनों को भरपूर आयु दी है। लता जी के हिस्से में भी बयानवे वर्ष लंबी आयु आई और आशा जी भी बयानबे वर्ष जी कर गईं हैं। उनकी बहनों में मीना जी की आयु चौरानवे वर्ष है और ऊषा जी की आयु नब्बे वर्ष। भाई हृदयनाथ मंगेशकर की आयु अट्ठासी वर्ष है। ऐसा कम ही होता है न?
आशा जी के व्यक्तिगत जीवन को सुखमय नहीं कहा जा सकता। अल्पायु में ही परिवार की इच्छा के विरुद्ध भाग कर अपने से दूनी आयु के व्यक्ति के साथ विवाह करना, और कुछ वर्षों बाद मन टूटने पर पछताते हुए वापस लौटना और अकेले ही बच्चों को पालना। कुछ गलतियां जीवन पर कितनी भारी पड़ती हैं, यह आदमी सही समय पर समझ नहीं पाता। फिर उनके सामने ही दो बच्चों का चले जाना। बेटे की कैंसर से मृत्यु और बेटी का आत्मघात…आशा फिर भी अपनी खनक बरकरार रख सकीं, यह भी अद्भुत ही है।
ईश्वर सबको सबकुछ तो नहीं ही देता है। किसी का एक पक्ष मजबूत तो दूसरा कमजोर, किसी का दूसरा मजबूत तो चौथा कमजोर। हिसाब लगाइए तो सबका टोटल मोटामोटी बराबर ही निकलता है। उसका गणित बहुत मजबूत है।
आशा जी के सैकड़ों गीत ऐसे हैं जो हमेशा सुने जाएंगे। सोचिए न, आज से हजार साल बाद भी किसी नवयुवक के कानों से “उड़े जब जब जुल्फें तेरी…” टकराए तो क्या वह मुस्कुरा नहीं उठेगा? कौन होगा जो “इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं” सुन कर मदहोश न होगा? आशा जी का शरीर पूरा हुआ है, संगीत तो सदैव तैरता ही रहेगा। आशा जी जा कर भी कहां जा पाएंगी…
कुछ लोगों की जिंदगी कितनी खूबसूरती से कट बोलती है, इसका उदाहरण देखिए। मैंने पढ़ा, वे अभी भी एक गीत की रिकॉर्डिंग कर रही थीं। एक दो बार रिहल्सल भी किया था, किसी भी दिन आ कर रिकॉर्डिंग करने की बात हुई थी। उस गीत का मुखड़ा देखिए – जाने दो, अब खुद से मिलने का मन है।
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।


