सर्वेश तिवारी श्रीमुख : रामायण..60 हजार स्क्रीन पर, पचास भाषाओं में सौ देशों तक वैश्विक अभियान
रामायण पचास से अधिक भाषाओं में रिलीज हो रही है। लगभग साठ हजार स्क्रीन पर एक साथ… सौ से अधिक देशों में… यह सुखद है। किसी भी पौराणिक कथा को एक साथ इतने बड़े फलक पर दिखाने का यह पहला ही प्रयास है। यूरोप अपने इतिहास को लेकर ऐसे प्रयास करता रहा है, पर हमारी ओर से यह पहली बार हो रहा है। रामकथा को दुनिया भर के सामने ले जाने का यह भव्य प्रयास कितना सफल होगा यह तो बाद में पता चलेगा, पर यदि सफल हुआ तो इसका असर ठीक ठाक होगा।
संभव है कि हमें कुछ अभिनेता पसंद न हों। यह भी संभव है कि कुछ दृश्य हमें सुंदर न लगें। अनेकों स्थान पर कमियां भी हो सकती हैं। वैसे भी, फिल्म बनाने वाले लोग कोई देवता तो हैं नहीं जो कमियां न छूटेगी… इसके बाद भी यह बड़ा और सुंदर प्रयास है। यदि यह फिल्म उम्मीद से आधी सुन्दर भी बनी हो, तो भी बहुत बड़ा असर छोड़ेगी।
माता की इच्छा का सम्मान करते हुए राज्य ठुकरा कर वनवास स्वीकार करते राम, बड़े भाई को उनका अधिकार देने के लिए राजधानी से वन की ओर पदयात्रा करते भरत, बड़े भाई के पीछे पीछे वन के दुख भोगने निकले लक्ष्मण, पुत्र के प्रेम में प्राण त्यागते राजा दशरथ की कथा यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका के दर्शकों के लिए नई तो होगी ही, वे इसी बहाने भारत और सनातन के आदर्श से परिचित हो सकेंगे। यह बुरा तो नहीं…
सीता की प्रतिष्ठा के लिए अपने युग के सबसे बड़े साम्राज्य से लड़ने निकले दो भाइयों से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। दुनिया सीखेगी कि अनुजवधु को हर लेने वाले बाली को स्वयं आगे बढ़ कर दंडित करना धर्म है। दुनिया करुणा सिंधु का पत्नी या भाई के लिए रोना भी देखेगी, और रावण और कुंभकर्ण जैसे दैत्यों के समक्ष तन कर खड़े होना भी… दुनिया देखेगी कि जीते हुए राज्य को भी वहीं के व्यक्ति को सौंप कर वापस लौटते राम कैसे बेदाग निकलते हैं लंका से… दुनिया देखे तो, कि धर्म कहते किसे हैं…

पारिवारिक मूल्यों के ज्ञान के लिए, मानव मूल्यों के लिए संसार को अंततः सनातन की ओर ही देखना होगा… सत्य असत्य, पाप पुण्य, धर्म अधर्म को लेकर भारतीय दृष्टिकोण जिस कथा में सर्वाधिक स्पष्ट दिखता है, वह कथा दुनिया भी सुने, देखे, समझे… उनका भी कल्याण ही होगा…


