देवांशु झा : चैट जीपीटी ; स्वाध्याय का अंत और कॉपी-पेस्ट विद्वानों का उदय!

चैट जीपीटी महोदय से वार्ता

आज महोदय से एक प्रश्न पूछा। प्राचीन भारत में मंदिरों को महाघटिका भी कहा जाता था। अर्थ स्पष्ट कीजिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर केवल देवगृह नहीं होते थे बल्कि पठन-पाठन और शिक्षण के केन्द्र भी होते थे। महाघटिका उसी संदर्भ में आता है। जीपीटी महोदय ने विस्तार से अर्थोद्घाटन किया।

Veerchhattisgarh

फिर मैंने पूछा कि घट का सम्बन्ध जल से है। घट में जल होता है। जल प्यास बुझाता है तो क्या घटिका का तात्पर्य ज्ञान की प्यास बुझाने वाला स्थल है? चैट जीपीटी महोदय ने व्युत्पत्ति से भेद बताया और कहा कि सीधा सम्बन्ध तो नहीं दिखाई देता परन्तु महोदय, आपका रूपक सुन्दर और विशिष्ट है। आपको प्रणाम।

ससुर, इतना शिष्ट आचार्य है यह चैट जीपीटी! मुझे हॅंसी आ रही थी।

मैं तो केवल इतना ही समझ पा रहा हूॅं कि आने वाले समय में स्वाध्याय और पुस्तकों की भूमिका ही नष्ट हो जाएगी। यह तो क्षणमात्र में बहुत कुछ उद्घाटित करता है। इसका सबसे बड़ा खतरा ईमानदार लेखक उठाएंगे। आजकल बहुत सारे कुपढ़ चोरों को चमत्कार करते हुए देख रहा हूॅं। दस पंक्ति शुद्ध हिन्दी लिखने में कांख देने वाले भी कबित्त रच रहे हैं। अलग-अलग भाषाओं में रच रहे हैं। कमाल है। चोरों का स्वर्णयुग आ गया है। कहीं यह स्वर्णों के खिलाफ मोदी जी का खड़यंत्र तो नहीं है?


कोई हमें भोजन पर बुलाता है तो हम अपनी पसंद का नहीं, उनकी पसंद का-उनके घर पर बना भोजन करते हैं। हमारा शिष्टाचार कहता है कि भोजन कराने वाले को धन्यवाद कहकर विदा हों।‌ भोजन कराने वाले को इतनी स्वतंत्रता तो हो कि वह अपनी इच्छा, सुविधा, रीति और परम्परा से भोजन कराए। हम अपने स्वाद और रुचि को उन पर थोपने के अधिकारी नहीं होते। यह केवल भोजन ग्रहण करने की बात नहीं बल्कि सहृदयता, स्वीकार्यता और कृतज्ञता की बात है। यहां मैं मांसाहार.. शाकाहार की बात नहीं कर रहा। हर मांसाहारी अनिवार्यतः शाकाहारी भी होता है और शाकाहारी मांसाहारी नहीं ही होता। हो ही नहीं सकता। इसलिए मांसाहारी किसी शाकाहारी के घर मांस की आशा नहीं कर सकता और शाकाहारी मांसाहारी के घर बने किसी मांस व्यंजन को घृणा से नहीं देख सकता। अस्वीकार उसका अधिकार है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *