मोदी कमजोर पड़ गए’ के शोर में दब गई असली खबर! ईरान से व्यापार, चाबहार और अमेरिकी टैरिफ पर भारत का सख्त रुख
नई दिल्ली। भारत में मीडिया की भूमिका को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि देश का एक बड़ा हिस्सा खबरों को केवल रिपोर्ट नहीं करता, बल्कि अपने-अपने राजनीतिक और वैचारिक नजरिए के अनुरूप एजेंडा सेट करता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकार के पक्ष में नैरेटिव तैयार करते दिखाई देते हैं तो कुछ विपक्ष के पक्ष में। ऐसे में सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति, राष्ट्रीय हित और वैश्विक मंच पर बदलती भारत की भूमिका की बात कौन करेगा?
हाल के SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति के बीच हुई बातचीत को ही देखिए। भारत और ईरान के पारंपरिक संबंधों को मजबूत करने, द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने और चाबहार बंदरगाह की भूमिका को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दे भारत की रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत की विदेश नीति के संदर्भ में इन घटनाक्रमों का असर केवल भारत और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक भू-राजनीतिक महत्व भी है।
यही वजह है कि इस घटनाक्रम को केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। भारत अपने व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों का विस्तार कर रहा है और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चाबहार भारत को मध्य एशिया और उससे आगे के बाजारों तक पहुंच का महत्वपूर्ण रास्ता प्रदान करता है।
लेकिन भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से की प्राथमिकताओं पर नजर डालें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। 500 किलोमीटर लंबे नए एक्सप्रेसवे के किसी हिस्से में बारिश के बाद बने गड्ढे को घंटों बहस का विषय बना दिया जाता है, लेकिन भारत की विदेश नीति में हो रहे बड़े बदलाव, नए व्यापारिक समीकरण और वैश्विक शक्ति संतुलन पर अपेक्षित गंभीर चर्चा अक्सर दिखाई नहीं देती।
इसी बीच अमेरिका की ओर से भारत पर टैरिफ और प्रतिबंधों को लेकर दबाव की बातें सामने आती रही हैं। इसके जवाब में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का रुख भी स्पष्ट रहा है कि व्यापार समझौता भारत के हितों और उचित शर्तों के आधार पर ही होगा। संदेश साफ है कि भारत किसी दबाव में जल्दबाजी में समझौता करने के बजाय अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना चाहता है।
भारत की रणनीति को व्यापक संदर्भ में देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। SCO, BRICS, ईरान के साथ संभावित व्यापार विस्तार, रूस और चीन के साथ व्यापारिक संबंध, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और विभिन्न देशों में UPI के बढ़ते इस्तेमाल जैसी पहलें भारत के आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों को व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इस पूरी प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है। भारत और अमेरिका के संबंध बहुआयामी और महत्वपूर्ण हैं। लेकिन भारत यह संकेत जरूर दे रहा है कि उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं होगी। नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अमेरिका, रूस, यूरोप, ईरान, खाड़ी देशों और एशिया की अन्य शक्तियों के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।
यही वह बड़ी तस्वीर है जिस पर देश में गंभीर बहस की जरूरत है। लेकिन जब मीडिया का एक हिस्सा 24 घंटे यह साबित करने में व्यस्त हो कि “मोदी कमजोर पड़ गए”, “मोदी समझौता कर चुके हैं” या “भारत सरेंडर कर रहा है”, तब विदेश नीति के वास्तविक घटनाक्रम और उसके पीछे की रणनीतिक गणित जनता की नजरों से ओझल हो जाती है।
सवाल किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया भारत के राष्ट्रीय हितों, उसकी विदेश नीति और दुनिया में बदलती उसकी भूमिका को उतनी गंभीरता से प्रस्तुत कर रहा है, जितनी गंभीरता से उसे करना चाहिए?
भारत को ऐसा मीडिया चाहिए जो केवल सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा न हो, बल्कि देश के पक्ष में खड़ा हो। जो सरकार से सवाल भी करे, विपक्ष से भी सवाल करे, लेकिन साथ ही दुनिया के सामने भारत की स्थिति, उसकी उपलब्धियों, चुनौतियों और रणनीतिक हितों को तथ्यपरक तरीके से रखे।
क्योंकि अंततः विदेश नीति टीवी स्टूडियो की बहसों से नहीं, राष्ट्रीय हितों की कसौटी पर तय होती है।
भारत अपनी विदेश नीति अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। अब जरूरत ऐसे दरबारी से परे ऐसे मीडिया की है जो इस बदलती तस्वीर को समझे, उसे जनता तक पहुंचाए और देश को केवल राजनीतिक नैरेटिव नहीं, बल्कि पूरी खबर और पूरी तस्वीर दिखाए।

