डॉ. वंदना चंदानी व बीमा कंपनी के विरुद्ध आदेश यथावत.. पढ़ें क्या है प्रकरण…
- राज्य उपभोक्ता आयोग ने जिला आयोग के आदेश को रखा यथावत
- कोविड जांच रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही का मामला,
- पीड़ित परिवार को 8.20 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति, ब्याज और वाद व्यय का आदेश
कोरबा। कोविड महामारी के दौर में जांच रिपोर्ट में कथित लापरवाही से जुड़ा एक गंभीर उपभोक्ता विवाद अब राज्य उपभोक्ता आयोग तक पहुंचने के बाद भी उसी निष्कर्ष पर कायम है। राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रांसपोर्ट नगर, कोरबा स्थित एडवांस डायग्नोस्टिक सेंटर की संचालिका डॉ. वंदना चंदानी एवं ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के मंडल प्रबंधक के विरुद्ध जवाबदेही तय करने वाले जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा के आदेश को यथावत रखा है।
दिनांक 11 जून 2026 को सुनाए गए आदेश में राज्य उपभोक्ता आयोग के पीठासीन विद्वान न्यायमूर्ति द्वय
श्री गौतम चौरड़िया (अध्यक्ष) व श्री प्रमोद कुमार वर्मा (सदस्य) ने जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसे यथावत रखा।
माननीय जिला आयुक्त द्वारा प्रतिवादी एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सेंटर की लापरवाही व उपेक्षा को प्रमाणित मानते हुए परिवादिनी को अनुतोष पाने हेतु पत्र पाया गया, किंतु एडवांस डायग्नोस्टिक सेंटर को ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के समक्ष बिमित होने के कारण क्षतिपूर्ति भुगतान का दायित्व बीमा कंपनी को दिया गया।
बीमा कंपनी द्वारा क्षतिपूर्ति राशि भुगतान के दायित्व से बचने हेतु माननीय राज्य आयोग के समक्ष अपील प्रस्तुत किया गया तथा बीमा कंपनी द्वारा अपना पक्ष रखा गया कि मृतक दिलेश्वर प्रसाद साहू की कोरोना से हुई मृत्यु के संबंध में एडवांस डायग्नोस्टिक सेंटर के द्वारा जांच रिपोर्ट विलंब से देने में कोई अपेक्षा व लापरवाह नहीं बरती गई है, इसलिए क्षतिपूर्ति भुगतान का दायित्व बीमा कंपनी को नहीं है।
राज्य आयोग द्वारा उभय पक्ष के तर्क श्रवण के उपरांत माननीय जिला आयोग द्वारा पारित आदेश को विधि सम्मत मानते हुए माननीय जिला आयोग के आदेश को यथावत रखते हुए तथा एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सेंटर द्वारा बरती गई उपेक्षा व लापरवाही को प्रमाणित मानते हुए एडवांस डायग्नोस्टिक सेंटर का ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के समक्ष बिमित होने के कारण क्षतिपूर्ति भुगतान का दायित्व बीमा कंपनी पर अधिरोपित करते हुए बीमा कंपनी द्वारा प्रस्तुत अपील को खारिज किया गया है।
क्या था पूरा प्रकरण ?
प्रकरण में परिवादिनी मानकी बाई एवं अन्य की ओर से प्रस्तुत परिवाद में बताया गया कि 31 अक्टूबर 2020 को दिलेश्वर प्रसाद साहू को कोविड जांच के लिए ट्रांसपोर्ट नगर स्थित एडवांस डायग्नोस्टिक सेंटर ले जाया गया था। आरोप है कि कोविड जांच की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके कारण उन्हें समय पर उपचार के लिए भर्ती नहीं कराया जा सका और अंततः इलाज के अभाव में उनकी मृत्यु हो गई।
परिवादिनी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि जांच रिपोर्ट में अपनी कथित गलती को छिपाने के लिए सैंपल लिए जाने तथा रिपोर्ट जारी किए जाने के समय को लेकर गंभीर विसंगतियां की गईं।
मामले में पेश दस्तावेजों के अनुसार रिपोर्ट में सैंपल लेने का समय अगले दिन 01 नवंबर को सुबह 10 बजे और रिपोर्ट जारी करने का समय 10:06 बजे दर्शाया गया था। परिवादिनी का दावा था कि जिस समय रिपोर्ट में सैंपल और रिपोर्ट जारी करने का उल्लेख है, उससे करीब दो घंटे पहले ही दिलेश्वर प्रसाद साहू की मृत्यु हो चुकी थी। इस संबंध में मृतक की मृत्यु तथा शव को मॉर्ग में रखे जाने से संबंधित दस्तावेज भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
46 पन्नों के आदेश में जिला आयोग की सख्त टिप्पणी
जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा ने अपने विस्तृत 46 पन्नों के आदेश में संस्थान की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर टिप्पणी की।
आयोग ने माना कि कोविड टेस्ट की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण परिवादिनी के पति को उपचार के लिए भर्ती नहीं कराया जा सका और परिणामस्वरूप उपचार के अभाव में उनकी मृत्यु हुई। आयोग ने यह भी कहा कि संबंधित संस्थान की जिम्मेदारी थी कि कोविड टेस्ट रिपोर्ट को ऐप पर अपलोड करने तथा रजिस्टर संधारण की प्रक्रिया की उचित निगरानी और मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाती।
आयोग के अनुसार इस संबंध में उचित प्रयास नहीं किया गया। इसी आधार पर जिला आयोग ने संस्थान की कार्यप्रणाली को उपेक्षा, उचित मानक स्तर की मॉनिटरिंग में कमी, घोर लापरवाही तथा व्यवसायिक कदाचरण की श्रेणी में माना।
आयोग ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि संस्थान की उपेक्षा और लापरवाही के कारण परिवादिनी को मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक क्षति हुई और वह क्षतिपूर्ति प्राप्त करने की अधिकारिणी है।
पीड़ित परिवार को 8.20 लाख रुपये की राहत
जिला आयोग ने परिवादिनी के पक्ष में आर्थिक क्षतिपूर्ति और अन्य मदों में महत्वपूर्ण राशि देने का आदेश पारित किया।
आदेश के अनुसार विरोधी पक्षकार क्रमांक – 04 को परिवादिनी क्रमांक – 01 को संस्थागत उपेक्षा से हुई क्षति के मद में 6 लाख रुपये का भुगतान करना है। इस राशि पर परिवाद प्रस्तुत करने की तारीख से आदेश दिनांक तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
इसके अलावा परिवादिनी को मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में 1 लाख रुपये तथा आर्थिक क्षति, जिसमें अंतिम संस्कार में हुआ व्यय भी शामिल है, के मद में 1 लाख रुपये देने का आदेश दिया गया है।
मामले में हुए वाद व्यय के लिए भी 20 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
इस प्रकार मूल क्षतिपूर्ति, मानसिक क्षति, आर्थिक क्षति और वाद व्यय को मिलाकर 8 लाख 20 हजार रुपये की राशि का आदेश दिया गया है। इसके अतिरिक्त आदेश के अनुसार निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करने पर आदेशित राशि पर आदेश दिनांक से वास्तविक भुगतान की तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
आदेश में स्पष्ट किया गया कि सभी आदेशित राशियों का भुगतान परिवादिनी को आदेश दिनांक से 30 दिवस के भीतर किया जाना है।
राज्य आयोग में भी नहीं बदला आदेश
जिला उपभोक्ता आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील राज्य उपभोक्ता आयोग के समक्ष पहुंची। सुनवाई के बाद 11 जून 2026 को राज्य आयोग ने जिला आयोग द्वारा पारित आदेश को यथावत बनाए रखा।
इस तरह कोविड महामारी के दौरान सामने आए इस मामले में जांच रिपोर्ट, उसकी समयबद्धता, रिकॉर्ड संधारण और मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी को लेकर उपभोक्ता आयोगों ने गंभीर दृष्टिकोण अपनाया है। परिवादिनी की ओर से तेजतर्रार अधिवक्ता अनीष कुमार सक्सेना ने प्रभावी पैरवी करते हुए मामले में अपना पक्ष मजबूती से जिला एवं राज्य उपभोक्ता आयोग में रखा। उनकी पैरवी में युवा अधिवक्ता ओ. श्रीनिवास भी उपस्थित रहे।

