देवांशु झा : सवर्ण आत्मसम्मान..भेदभाव का सच
पिछले तीन दिनों से प्रचण्ड ऊहापोह में हूॅं। एक अंतर्द्वंद्व चल रहा कि मुझे इस विषय पर लिखना चाहिए या नहीं। फिर मैंने बड़ी संख्या में लोगों को देखा जो सवर्ण आत्मसम्मान की गर्जना कर रहे थे। मैंने सोचा, यह भी ठीक है! आत्मसम्मान तो उनका ही होगा जो सबल रहे। कल ही मैंने अपने पांच मित्रों से फोन पर बात की। वे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के अलग-अलग अंचलों में रहते हैं। सबने स्वीकार किया कि भैया, आज भी जब अवसर मिलता है हमारे अपने सगे,गांव के दबंग और उच्च जाति के लोग दलितों, छोटी जाति के लोगों को अपमानित करने, दुरदुराने का मौका नहीं छोड़ते। एक मित्र ने बताया कि राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय उनके गांव में यात्रा निकाली गई जिसमें उसके बहुत दबाव के बाद दलितों को बुलाया गया। वे सहर्ष आए और शामिल हुए।
उस दिन जंतर-मंतर पर चूंदी वाला क्रांतिकारी बालक चीख रहा था कि बताओ किसने भेदभाव किया, हम माफी मांगते हैं। मुझे बहुत तरस आया था। बेईमानी हो तो ऐसी! परन्तु यह तो अधिकांश सवर्णों का मनोभाव है जो यह कहता है कि नहीं, हमने कभी भेदभाव किया ही नहीं। मैं हॅंसता हूॅं। फ़रवरी 1973 का जन्मा हूॅं। 53 वर्ष का जीवन देख लिया है। आरम्भिक सोलह वर्ष गांव में काटे हैं। सफेद झूठ न बोला करो! बहुत दया आती है तुम पर ! पटना में मेरा एक दलित साथी था। 1991-92 की बात है। अत्यंत प्रिय मित्र था। लगभग हर दिन उसके घर जाता। खाने-पीने की तो कोई बात ही नहीं थी। एक दिन दुबे जी नाम के सज्जन मुझे धर लिए। कहने लगे- है मरदे, झाजी.. आप उसके घर में खाना खाते हैं? दुबे जी ने मुझे पांच अलग-अलग मौकों पर धिक्कारा। मैं हर बार हॅंसकर आगे बढ़ता रहा।।
अपने गांव की ओर लौटता हूॅं। तब शौच के लिए बहुत सारे लोग खेत में जाते थे। कुछ लोगों के घर शौचालय था। कुछ ने टीन के डिब्बे लगा रखे थे। उसी में विष्ठा गिराते। एक स्त्री शौचालयों की सफाई करने आती थी। उसके लिए पिछला द्वार खोला जाता था। वह बेचारी विष्ठा से भरा कनस्तर फेंकने जाती। दस घरों के शौचालय साफ कर थकी हारी मेरे द्वार पर आती और पुकारती..हे दादी..! उसकी पुकार आज तक मुझे बेधती है। मैंने वह सब ठहर कर देखा है। धन्य मानता हूॅं कि मेरे माता-पिता ने कभी अभद्रता का पाठ नहीं पढ़ाया। परन्तु उसकी अथाह अंतहीन पीड़ा पर किसका हृदय पिघला था? मैं दसवीं में था। यदा-कदा कुछ लिखकर रख लेता। जीवन की पहली कहानी उस स्त्री पर लिखी थी।
मैं अपनी मां को याद करता हूॅं तो मन गौरव से भर उठता है। उन्होंने एक जटिल परिवार के महाउद्दंड लोगों को झेलते हुए सबको जोड़े रखा। भूल से भी कठोर वचन नहीं कहे। गाली अभद्रता तो बहुत दूर की बात हो गई। परन्तु मेरी मां के लिए मेरे पिता थे। बड़ा सा घर था। वैभव था। उस स्त्री के जीवन में क्या था? अमावस का अनंत आकाश! उसकी कथा कौन लिखता? मैं आज भी उसे याद करता हूॅं तो मेरा हृदय हाहाकार कर उठता है। तुम आत्मसम्मान की बात करते हो? तुमने उस ताप का शतांश भी झेला होता तो समझते। जब भोज-भात होता तो जूठी पत्तलें छत से फेंकी जातीं तब कुत्ते और वे लड़ते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे कभी सड़क पर खड़े हुए
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए–निराला
कविता पढ़ी होगी? निराला ने कुछ देखकर ही लिखा होगा।
मैंने विशाल भू-भाग की यात्रा की। वन, बीहड़, गांव, कस्बे, शहर भटकता रहा। हर बार यही देखा कि कथित छोटा आदमी बड़ा मनुष्य है। सच्चा सनातनी भी है। वह कभी निरादर नहीं करता। तुम उसे थोड़ा सा प्रेम और सम्मान दोगे तो वह तुम पर निछावर हो जाएगा। मैं आश्चर्य से भर उठता हूॅं जब यहां की कथित उच्च जाति के लोगों को दर्पस्फीत मन से कहते हुए पाता हूॅं कि हमने तो कभी भेदभाव किया ही नहीं। आज भी इतनी सख्ती के बाद बहुत बड़ी संख्या में यह मानसिकता है कि तुम मौका मिलते ही उसे अपमानित करते हो। परन्तु अब समय बदल गया है। वह पलट कर जवाब देता है और तुम तिलमिला उठते हो। इस सत्य से मना नहीं किया जा सकता कि समय का चक्र घूम गया है इसलिए निर्दोष लोग भी पिस रहे हैं। लेकिन यह तो नियति है। कर्मफल का सिद्धांत बांचते हो !
भाई, आप राम का नाम लेते हैं। राम ने निषादराज को भरत सम भ्राता कहा था। पक्षीराज जटायु को पिता की प्रतिष्ठा दी। वानर राज सुग्रीव को भाई माना। आप छूटते ही भीमटे, नीलटे, नीला कबूतर कह डालते हो। वह अंबेडकर की पूजा करता है तो करने दो। उसे वैसा करने का अधिकार है। अगर अपना मन बड़ा कर उन्हें हृदय से लगाया होता और कहा होता कि हमारे अपराध क्षमा कर दो तो वह हमारे साथ खड़ा होता। अंबेडकर आकाश से नहीं उतरे थे। उन्होंने भेदभाव महसूस किया तो लिखा। अतिशयोक्ति होगी, मना नहीं करता पर आप उसे झूठ झूठ कहकर अपने मन को ठगते हैं। प्रेमचंद की हर कहानी पढ़कर उन्हें एजेंडाबाज कह सकते हैं। जूठन पढ़कर उसे झूठ कह सकते हैं पर सत्य तो अटल रहेगा।
मैं मानता हूॅं कि हमारे धर्मग्रंथ इस भेदभाव की प्रतिष्ठा नहीं करते। यह अस्पृश्यता बहुत हद तक पिछले ढाई तीन सौ वर्षों में पनपी, पनपाई गई परन्तु कभी तो परिष्कार करना था। आत्मावलोकन करना था। केवल उच्च जाति में जन्म लेने का घमंड पालने का क्या अर्थ है? बचपन में उत्तंक मुनि की कथा पढ़ी थी। तपते रेगिस्तान में उनका कंठ सूख रहा था। इन्द्र चाण्डाल का रूप धर कर आए। उनके कमंडलु में अमृत था। वे बोले, पी लीजिए मुनिवर ! मुनिवर क्रोधित हुए। इन्द्र अंतर्धान हो गए। भगवान कृष्ण आए। उन्होंने कहा, इन्द्र थे, आपके लिए अमृत लाए थे। परन्तु ब्राह्मण और चाण्डाल में भेद करने वाला अमृत का अधिकारी नहीं हो सकता। आत्मसम्मान आपका है तो उनका भी बराबर का है। वे भी ईश्वर के प्रिय पुत्र हैं। सहृदय बनिए। ( ध्यान रहे! जो लिखा है, वह कुछ भी नहीं है!)


