सुरेंद्र किशोर : इसे दो–मुंहा…..कहें या दो–गले का…. ?!
भारत की आजादी के लिए सबसे बड़ा आन्दोलन सन 1942 में हुआ।
उसमें नारा ही चल पड़ा था- ‘‘करो या मरो।’’
सी.राजगोपालाचारी यानी राजा जी ,(गांधी जी के समधी)डा.आम्बेडकर और डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1942 की लड़ाई में शामिल नहीं हुए थे।सी.पी.आई.भी शामिल नहीं ।
इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में ये तीनों नेता शामिल हुए।
–यानी,आम्बेडकर,मुखर्जी और और राजाजी।
इतना ही नहीं,प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू, डा.राजेंद्र प्रसाद के बदले राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने के लिए पार्टी में अड़ गये थे।नेहरू ने धमकी दी थी कि यदि पार्टी, राजा जी को राष्ट्रपति नहीं बनाएगी तो मैं प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा।इस पर किसी शीर्ष नेता ने कहा था–‘‘तो दे दो इस्तीफा।’’
न तो राजा जी राष्ट्रपति बने और न ही नेहरू ने इस्तीफा दिया।
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सन 1962 में चीन के हाथों पराजय के बाद 1963 में जब गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा था तो नेहरू ने
आर.एस.एस.के स्वयंसेवकों को उस परेड में शामिल होने के बुलाया।
वे शामिल हुए भी।
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1965 के पाक-भारत युद्ध के समय आर एस एस के स्वयंसेवकों ने दिल्ली की ट्रैफिक व्यवस्था संभाली थी।
अब बाकी बातों-विवादों का फैसला आप कर लीजिए।
उन आरोप-प्रत्यारोपों के बारे में अपनी धारणा बना लीजिए जो इन दिनों लगते-लगाए जा रहे हैं।यह कि कौन आजादी की लड़ाई में शामिल हुआ और कौन नहीं हुआ।
हालांकि हाल में एक टी.वी.डिबेट में एक भाजपा प्रवक्ता को यह कहते सुना कि संघ के करीब सौ लोग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे–पर उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया।यदि यह सच है तो उनके नाम सामने आने चाहिए।

