टीशा : विदेश नीति ; राष्ट्रीय मंच पर सस्ता मजाक, राजनीति का गिरता स्तर
पुराने राजदरबारों में विदूषक हुआ करते थे। उनका काम था राजा और दरबारियों को हँसाना! वे राजा पर भी चुटकी ले लेते थे, और कभी मंत्री की पगड़ी पर भी तंज कस देते थे। दरबार हँसता था, विदूषक अपनी टोपी उतारकर झुकता था और फिर अगला मजाक शुरू कर देता था।

कांग्रेस के राष्ट्रीय सम्मेलन का वह दृश्य देखते हुए मुझे यही बात याद आ गई।
राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति पर बोल रहे थे, सामने संदीप दीक्षित अपने हल्की सोच को ढोकर लाए… राहुल गांधी ने उन्हें गले लगा लिया। फिर बात गले मिलने से निकलकर जॉर्जिया मेलोनी तक पहुँची और ऐसा मजाक हुआ कि पूरा सभागार ठहाकों से गूँज उठा।
मुझे समझ न आया कि यह मोदी की विदेश नीति पर चर्चा हो रही थी, या किसी शादी में रिश्तेदारों के बीच छेड़छाड़ चल रही थी?
क्या राहुल गांधी को भारत की विदेश नीति में सचमुच बस इतना ही दिखाई देता है कि मोदी किसे गले लगाते हैं?
डेढ़ दशक पहले तक भारत दुनिया के बड़े सम्मेलनों में मौजूद तो रहता था, लेकिन अक्सर पीछे खड़ा दिखाई देता था।
मनमोहन सिंह के दौर की तस्वीरें याद हैं? एक कोने में गुमसुम खड़े प्रधानमंत्री को देख क्या आपको नहीं लगता था कि इन बड़े देशों के बीच हमारी मौजूदगी इतनी फीकी क्यों हैं?
आज वही भारत है जिसका प्रधानमंत्री दुनिया के बड़े नेताओं के बीच बैठता है, जिसकी बात सुनी जाती है, जिससे मिलने के लिए समय निकाला जाता है।
आज भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका जाए तो दुनिया देखती है। सऊदी जाए तो दुनिया देखती है। बड़े मंच पर बोले तो दुनिया सुनती है। लगातार बजती तालियों की गड़गड़ाहट न सिर्फ रिकॉर्ड बनाती हैं, बल्कि हम सभी के सम्मान और स्वाभिमान की भी इक नई इबारत लिखती हैं। कई मौकों पर जिस तरह तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है, वह किसी एक आलिंगन की कहानी नहीं है।
यह एक बदलते भारत की तस्वीर है।
चलिए, एज ए विपक्षी आप इस बदलाव को मोदी की उपलब्धि मत मानिए…आप इसे संयोग कह दीजिए! कह दीजिए कि इसमें मोदी की कोई भूमिका नहीं।
लेकिन तब विदेश नीति पर बात कीजिए..बताइए कि कौन सा समझौता गलत है? किस देश के साथ संबंध खराब हुए? भारत को कहाँ नुकसान हुआ….कहाँ सरकार असफल रही।
लेकिन राहुल पूरी नीति को एक गले लगाने तक समेट देते हैं, तो समस्या उनकी सोच के हल्केपन और नजर में ही ज्यादा दिखाई देती है।
किसी प्रधानमंत्री के किसी विदेशी नेता से गले मिलने को पकड़कर पूरी विदेश नीति समझा देना तो वैसा ही है जैसे कोई पूरी फिल्म देखकर सिर्फ एक आलिंगन पर समीक्षा लिखे।
और फिर उस आलिंगन को समझाने के लिए एक महिला और दूसरे देश की प्रधानमंत्री को अश्लील मजाक में घसीट लाना?
जॉर्जिया मेलोनी इटली की प्रधानमंत्री हैं, वह भारत की प्रधानमंत्री नहीं हैं। वह भाजपा की नेता नहीं हैं। वह राहुल गांधी की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी कतई नहीं हैं।
उनका भारतीय प्रधानमंत्री से मिलना अंतरराष्ट्रीय संबंध है, कोई गली-मोहल्ले की चटपटी कहानी नहीं!
राहुल ने राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर उनका नाम उस तरह लिया गया, जिस तरह किसी महिला का नाम लेकर सड़क किनारे या चाय की गुमटी पर बैठे निखट्टू लोग ठहाके लगाते हैं। महिलाओं पर फब्तियां कसते हैं!
सत्ता पाने की वासना जब आदमी को हर गली की भाषा, हर सस्ते मजाक और हर गंदे इशारे तक ले जाए, तब आदमी विरोधी को नहीं, खुद को छोटा करता है।
राहुल विदूषक बने और सामने बैठे लोग हँसे भी…लेकिन उनके सामने कोई राजदरबार नहीं था। सामने उनकी अपनी पार्टी के लोग बैठे थे और उस मंच के बाहर एक जनता थी, जिसने बाद में टीवी और वीडियो के माध्यम से उनकी इस छिछली हरकत को देखा।
बस फर्क इतना है कि पुराने विदूषक ने टोपी उतारी थी, यहाँ टोपी के साथ विदूषक ने अपना चरित्र और राजनीति की गरिमा भी उतारकर दर्शकों की तरफ उछाल दी।
सत्ता की चाह में जब नेता विदूषक बन जाए, तो दरबार की हँसी के साथ… पूरा देश शर्मिंदा होता है!
बाकी तो…



