परख सक्सेना : सिंधिया परिवार की विरासत का मामला सुलझ गया और वसुंधरा राजे पार्टी उपाध्यक्ष हो गयी, कुछ तार तो जुड़े है

1725 के आसपास की बात है पेशवा बाजीराव और छत्रपति शाहूजी महाराज की वार्ता लम्बी हो गयी। पेशवा कक्ष से बाहर निकले तो देखा कि उनका पहरेदार उनके जूते सीने से लगाकर सो रहा है। उन दिनों मे जूते मे भी जहर मिलाया जाता था, पेशवा प्रसन्न हो गए और पहरेदार उनका सेनापति बन गया।

पहरेदार का नाम था राणोंजी शिंदे, शिंदे शब्द सिंधिया मे बदल गया। किस्मत देखिए 1731 मे पेशवा बाजीराव के घोड़े उज्जैन तक पहुंचे और और ये पहरेदार अब सूबेदार बन गया। यही से सिंधिया वंश की नींव पड़ी, पहले इनकी राजधानी उज्जैन हुआ करती थी मगर राणोंजी के बेटे महादजी सिंधिया उसे ग्वालियर ले गए।

Veerchhattisgarh

1731 से आज तक सिंधिया परिवार का कोई ना कोई सदस्य हमेशा किसी राजनीतिक पद पर रहा है। 1956 मे मध्यप्रदेश बना तो ग्वालियर रियासत का उसमे विलय हुआ, 1979 तक स्थिति कुछ ऐसी बन गयी कि महाराज माधवराव सिंधिया कांग्रेस के खेमे मे चले गए और राजमाता विजया राजे सिंधिया बीजेपी के खेमे मे।

माँ बेटे के संबंध बिगड़ गए, सम्पत्ति का बंटवारा हुआ तीन चौथाई हिस्से मे कोई समस्या नहीं आयी मगर एक चौथाई हिस्सा लड़ाई का मैदान बन गया। उस एक चौथाई हिस्से की क़ीमत 40 हजार करोड़ रूपये थी, 1989 से ये विवाद चलता रहा। माधवराव सिंधिया की मृत्यु हुई तो ज्योतिरादित्य सिंधिया महाराज बने।

लड़ाई वही रही बस माधवराव की जगह उनके बेटे ज्योतिरादित्य आ गए और राजमाता की जगह उनकी बेटियां वसुंधरा और यशोधरा आ गयी। लेकिन इसमें सबसे प्रमुख विकास तब हुआ ज़ब कांग्रेस का पतन होने लगा और ज्योतिरादित्य की स्थिति कमजोर होने लगी। 2019 मे सिंधिया अपनी ही सीट पर हार गए और एक अलार्म बजने लगा।

ज्योतिरादित्य को इस बात का सुकून भी रहा कि उनकी बुआ भी राजस्थान मे हार चुकी थी, कांग्रेस डूबता जहाज थी और राजनीति से ज्यादा बड़ी चिंता अब सम्पत्ति हो चुकी थी। महाराज जानते थे कि भविष्य बीजेपी का है, इसलिए 2020 मे अंतर्रात्मा जाग उठी।

जो महाराज 2019 तक सेक्युलर थे वे अचानक मराठा होकर हर हर महादेव करने लगे, कमलनाथ की जुगाड़ की सरकार गिरा दी और बीजेपी के झोली मे सिंधिया परिवार का और एक अहसान डाल दिया। इसमें एक एंगल वडोदरा के गायकवाड़ राजपरिवार का भी है, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया का ससुराल है और मोदीजी का बिल्कुल ख़ास।

मोदीजी और गायकवाड़ो का रिश्ता इतना ख़ास है कि कहा जाता है ज़ब मोदीजी 2014 मे वडोदरा से लड़े थे तो गायकवाड़ ने खुला समर्थन किया था। ऐसे मे ज्योतिरादित्य बीजेपी मे लौटे और अब पूरा परिवार बीजेपी मे है। महाराज अब केंद्रीय दूरसंचार मंत्री है, बुआ अध्यक्ष बन गयी।

2024 मे अपनी गुना सीट वापस 7 लाख वोटो से जीती जो कि उस सीट का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है, फिर 2026 मे बीजेपी नेताओं के ही सानिध्य मे प्रॉपर्टी विवाद भी सुलझा। महाराज आज भी दो बड़े मंत्रालय संभालते है और बुआ अब पार्टी की उपाध्यक्ष है।

वक़्त का तकाजा देखिए, पेशवा के जूते पकड़ना छोटा काम नहीं था अपितु दायित्व था। दायित्व के उस निर्वहन से 300 वर्षो की हुकूमत तक का सफर बहुत कुछ बताता है, जरूरत है एक अलग चश्मे से देखने की।

✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *