कौशल सिखौला : वंदेमातरम.. बवाल पर सवाल
किस्सा कुर्सी का था तो फिर अंत तक आई क्यों नहीं कुर्सी ?
किसे बहला रहे हो ….
पानी के बुलबुले बना रहे हो ?
वे रोकतीं रहीं , काफी असहज थीं , बात मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से होते हुए संबंधित सेवादल प्रभारी तक पहुंचे तब तक वन्देमातरम का भगवती दुर्गा से जुड़ा वह छंद बज उठा , जिसे रोकने को सारा अलिहान कर रहीं थीं । सोनिया गांधी नहीं चाहतीं थी कि कांग्रेस के आयोजन में पूरा राष्ट्रगीत बजाया जाए । परन्तु व्यवस्थापक सेवादल जानता था कि बंकिम बाबू द्वारा लिखा छह छंदों का पूरा राष्ट्रगीत गाया जाना अनिवार्य है चूंकि यह कानून बन चुका है । संसद में कांग्रेस ने इसे सर्वसम्मति से पास कराया था । फिर भी सोनिया आगबबूला थीं किन्तु देर हो चुकी थी ।
अब कांग्रेस के प्रवक्ता तरह तरह के बचकाने बयान देकर बता रहे हैं कि सोनिया गांधी को कुर्सी की जरूरत थी । कोई कह रहा है कि खड़गे के लिए कुर्सी मंगा रही थी । लेकिन जो होना था , हो चुका था । संसद परिसर में बंदर नचा रहे पवन खेड़ा 1937 के कांग्रेस अधिवेशन का हवाला देकर बता रहे हैं कि हम तो दो ही छंद गाने के अभ्यस्त हैं । बता दें कि ये वही पवन खेड़ा हैं जो हेमंता के खेड़ा का पेड़ा बनाने की धमकी से इतना भागे कि बाल और दाढ़ी बढ़ते बढ़ते सफ़ेद हो गए । इतने सफ़ेद कि सोनिया गाँधी उनका नाम भूल गईं , सफेद बालों वाला कह कर संबोधित करने लगीं ।
खैर ! प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से दिमागी नक्सल की बात कहकर कांग्रेस सहित तमाम सफेदपोशों को विचलित कर दिया । अब तक माओवादी , नक्सलपंथी और शहरी यानि अर्बन वामपंथी या अर्बन नक्सलपंथी शब्द सुने थे । सोनिया भी हैरान होंगी कि यह दिमागी नक्सलपंथ शब्द कहां से आ गए ? दिमागी नक्सली शब्द नया है पर बड़ा दर्दनाक है । यह उन फितूरी सफेदपोशों की ओर इशारा करता है जो देश के पुरातन से जलते हैं , सनातन से जलते हैं और देश की प्रगति को डुबोना चाहते हैं , जो वन्देमातरम से परहेज करते हैं ।


