परख सक्सेना : मोहन भागवत की अमेरिका-कनाडा यात्रा क्यों बनी चर्चा का विषय? संघ की दूरगामी रणनीति को समझिए
मोहन भागवत कार्यक्रम करते रहते है लेकिन अमेरिका और कनाडा जाना एक चर्चा तो मांगता है। ऐसा क्यों है कि संघ प्रमुख का अमेरिका जाना हुआ और धु धु करके आग फ़ैल गयी।
डॉ हेडगेवार का लक्ष्य था कि भारत को फिर से जग सिर मोर बनाना है, RSS की स्थापना के साथ ही यह भी निर्धारित हो चुका था कि संघ 5 वर्ष की ईकाई में फैसले नहीं लेगा वह दूरगामी लक्ष्यों को साधता है। यही कारण है कि RSS ने प्रत्यक्ष रूप से खुद को राजनीति से अलग रखा है वो अलग बात है कि प्रधानमंत्री समेत गृह, रक्षा और वित्त मंत्रालय संघी ही चला रहे है।
संघ आजादी से पहले समझ चुका था कि शिक्षा ही पहला हथियार होगा इसलिए विद्या भारती बना, उसे पता था कि मजदूरों और किसानो को कम्युनिस्टों से बचाना होगा इसलिए दोनों के संघ बने मगर एक बात कॉमन रही कि इसकी तैयारी दशकों पहले से हो चुकी थी। विश्व हिन्दू परिषद भले ही 1964 में बना मगर इसकी नींव 1930 के समकालीन रख दी गयी।
बीजेपी का पता नहीं मगर RSS एक संगठन है जिसे आज पता है कि 2056 में वे क्या कर रहे होंगे, उनके पास हर प्लान है 2029 में बीजेपी हार ही क्यों न जाए RSS को पता है कि तब कैसे काम करना है। बीजेपी छोड़िये देश में यदि मुगल सल्तनत भी आ जाये तो RSS के पास प्लान बी निश्चित रूप से होगा।
मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा इसीलिए चर्चा में है, मोहन भागवत अपने मिशन पर है उन्हें भारत को विश्व के केंद्र में लाना है और इसके लिए जरूरत पड़ती है शाखाओ और संगठन की। पिछले 12 वर्षो में शाखाओ की संख्या में शानदार बढ़ोत्तरी हुई है, विदेशो में भी RSS ने बहुत अच्छा नेटवर्क बना लिया है।
कहने में कोई परहेज नहीं कि संघी कही का भी हो उसे पता है की व्यवस्था में घुसकर भारत के हित कैसे साधने है। बिल्कुल लोग अब कमेंट करेंगे कि आरक्षण लगाकर ये हो गया वो हो गया, शायद लेख नेपाल में आयी बाढ़ पर भी लिखा होता तो भी ऐसे साइड कमेंट्स अपना रास्ता बना लेते है।
लेकिन मार्ग की बाधाये जो भी हो आप लक्ष्य भूलना अफोर्ड नहीं कर सकते, लक्ष्य आज भी अखंड और समृद्ध भारत ही है। संघ की सरकारों से जितनी मर्जी नाराजगी हो आप अपनी भारत माता को मलेच्छो के हवाले तो नहीं कर सकते। तकरार रखिये मगर सौदेबाजी आप सरकार की नहीं अपितु स्वयं की कर रहे होंगे।
विषय पर लौटे तो देश के दुश्मन भी कम नहीं है, मोहन भागवत को रोकने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प को चिट्ठियां भेजी गयी और यहाँ वी लव ट्रम्प चाचा। बड़बोले चाचा ने चुप रहकर संघ प्रमुख को आने दिया, ये एक चमत्कार है। कनाडा में जब विरोध हुआ तो वहाँ का हिन्दू और ज्यादा जागरूक निकला, करीब 100 हिन्दू संगठनों ने मार्क कार्नी को चिट्ठी भेज दी।
ये हिन्दू चेतना का दौर है, हिन्दू कही भी हो उसे शत्रुबोध हो रहा है और इसी से लोगो को खुजली भी हो रही है क्योकि यदि हमारा तंत्र एक बार बन गया तो इनका तंत्र धरा रह जायेगा। मोदीजी अपना काम कर रहे है और मोहन भागवत अपना, दोनों एक ही लक्ष्य को साधने में लगे है प्रार्थना कीजिये सफलता हमे ही मिले।
संघ को भूल भी जाए तो यही वे विचार है जिनके लिए महाराणा सांगा भी लड़े, गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने पुत्रो की आहुति दी और छत्रपति संभाजी महाराज ने बलिदान दिया। कई बार ऐसा हुआ कि हम इस स्वप्न को छूने के बहुत करीब थे और होते होते रह गया उदाहरण खानवा और पानीपत के युद्ध में है।
हम हिन्दू निर्णायक युद्ध हारने के आदि रहे है लेकिन ये अंतिम निर्णायक युद्ध है इसके बाद फैसला हो जायेगा कि हिन्दू भी माया और मेसोपोटेमिया सभ्यता की तरह अवशेषों में रह जाएगा या फिर वाजपेयी की कविता की तर्ज पर “गगन में लहराता है पूज्य भगवा हमारा” को चरितार्थ करेगा।
आपको ना तो शस्त्र उठाने है ना ही युद्ध लड़ने जाना है, या तो जागृति फ़ैलाने के लिए बोलना और लिखना है या फिर बस मुंह बंद भी रख लोगे तो भी अपनी जननी और मातृभूमि पर अहसान कर सकते हो बस इतना करना है कि बकवास नहीं करनी है आपकी जंग कोई और लड़ रहा है उसे लड़ने दो और जीतने दो।
✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi
-आंशिक संशोधित।


