अमित सिंघल : PM ; अमित शाह, योगी या हिमंत से बेहतर कौन? PM मोदी की चुप्पी को कमजोरी समझना भूल..

एक विचार समय-समय पर देखने को मिलता है कि गृह मंत्री अमित शाह जी को ही फ्री हैंड दे दिया जाये तो वो मोदी जी से बेहतर विकल्प है। योगी जी या हिमंत शर्मा, और ना जाने कितने लोग भाजपा मे ही मोदी से कई गुना बेहतर विकल्प हैं।

इस विषय पर आत्म-चिंतन करते है।

Veerchhattisgarh

प्रधानमंत्री को कई चेक्स एंड बैलेंसेस (checks and balances) में काम करना होता है।

प्रथम, कई विधेयकों के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो नहीं है।

द्वितीय, संसद से दो किलोमीटर दूर सर्वोच्च न्यायालय है जिसमे सिबल एंड कंपनी जब चाहे केस के द्वारा कार्यपालिका के लिए बाँधा खड़ी कर सकती है। बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन के नाम पर ज्यूडिशरी के तथाकथित राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो सकते है? इंदिरा गाँधी की सारी शक्तियों को एक उच्च न्यायालय ने प्रभावहीन कर दिया था।

तृतीय, कई विषयो पर विदेशी नेतृत्व से वार्तालाप करनी होती है जिसमे आप के घरेलु स्टेटमेंट एवं कार्यवाई का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, खाड़ी में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते है, विदेशी मुद्रा घर भेजते है। आप अधिकतर तेल-गैस के लिए इन राष्ट्रों पर निर्भर है। भारत का एक बड़ा मार्ग इन राष्ट्रों के ऊपर से या समुद्र से पास होता है। आप इन राष्ट्रों के द्वारा सीमा पार गतिविधियों पर भी कण्ट्रोल रखते है।

चतुर्थ, आप को सीमा सुरक्षा, मुद्रा की स्थिरता, अंतर्राष्ट्रीय संधियां, एवं राष्ट्रीय हितों को अंतरराष्ट्रीय संगठनों में साधना होता है, जिसके लिए अन्य राष्ट्रों के वोट चाहिए।

पंचम, आपको अन्य राष्ट्रों से व्यापार करना होता है, भारतीय उद्यमियों के लिए अन्य देशो में लॉबिंग करनी होती है, अपने लिए निवेश एवं तकनीकी की व्यवस्था करनी होती है। साथ ही अति-आधुनिक रक्षा उपकरण भी चाहिए। आप को चीन को शांत रखना है, इस समय वाले अमेरिका को कुछ दूर रखना होता है, फ्रांस-ब्रिटेन-जर्मनी-इटली-जापान से व्यापार संधि करनी है, और कनाडा को खालिस्तानियों के द्वारा द्विपक्षीय सम्बन्धो को होने वाले नुकसान के बारे में समझाना है।

छठा, मुख्यमंत्री हिमंत शर्मा घुसपैठियों को वापस भेज सकते है, प्रधानमंत्री को अगले देश को “पुचकार कर” शांत करना होता है। इस रणनीति में लगता है कि शर्मा जी आग उगल रहे है, जबकि प्रधानमंत्री कुछ दबे से लगते है। लेकिन इसे good cop, bad cop (अच्छा पुलिसवाला, बुरा पुलिसवाला) रणनीति कहा जाता है। एक डंडा मारता है, दूसरा पहले वाले के डंडे का भय दिखाकर काम करा ले जाता है।

सातवां, दिल्ली मीडिया का गढ़ है। छोटी सी घटना, धरना, प्रदर्शन, अपशब्द, छोटी-मोटी हिंसा राष्ट्रीय समाचार बन जाता है।

अंत में, एक प्रधानमंत्री को प्रतिदिन हर उस अनदेखी, आकस्मिक समस्या से डील करना होता है, जिसके बारे में आमजन को पता ही नहीं चलता है। और जो मुख्यमंत्री या उस समस्या से ना डील करने वाले मंत्री की जानकारी में भी नहीं होती है। उदाहरण के लिए, RAW की ब्रीफिंग प्रधानमंत्री को मिलती है, गृह मंत्री को केवल आवश्यकता होने पर। मुद्रा या बैंकिंग पर आया संकट के बारे में वित्त मंत्री से सलाह ली जाती है, ना कि गृह मंत्री से। कतर से नेवी अफसरो को छुड़वाने के लिए विदेश मंत्री एवं डोवाल साहेब से सलाह ली जाती है। यही स्थिति परमाणु हथियार, टैक्टिकल वेपन्स, रक्षा सम्बन्धी स्पेस तकनीकी इत्यादि की है।

निश्चित रूप से, अमित शाह, योगी जी या हिमंत शर्मा एक उत्तम नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम है। लेकिन क्या वे उपरोक्त चेक्स एंड बैलेंसेस से मुक्त रहेंगे? क्या वे दलित-पिछड़ी राजनीति को इग्नोर करके संसद में बहुमत ला सकते है, विधेयक पास करवा सकते है?

आवश्यकता इस बात की है कि प्रधानमंत्री मोदी एवं उनकी टीम की रणनीति, चातुर्य एवं दृढ़निश्चय को समझने का प्रयास करे जो इतने चेक्स एंड बैलेंसेस के बाद भी राष्ट्रवादी नीतियों पर आगे बढ़ते जा रहे है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *