सर्वेश तिवारी श्रीमुख : यकीनन ना ये जौहर समझ पाएंगे, ना साका…
स्वरा प्रकरण में आप वामी लेखकों की पोस्ट देखिए, आपको उनकी धूर्तता स्पष्ट दिखने लगेगी। वे जौहर को सीधे रेप के भय से जोड़ने लगे हैं। इसी बहाने स्त्रियों की परतंत्रता और पुरुषवाद का फर्जी नैरेटिव…दरअसल स्वराएं इनकी प्रारंभिक टूल हैं। वे बोलती हैं, उसपर बवाल होता है, और उसके बाद ये लोग अपना एजेंडा लेकर कूदते हैं।
इन अनपढ़ जाहिलों से पूछा जाय, जौहर के साथ ही पुरुषों का साका होता था। सारे पुरुष युद्धभूमि में उतरते और अंतिम सांस तक शत्रु से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति देते थे। वे बच्चे जिनकी मूंछ भी न आई होती थी, और वे वृद्ध जिनकी आँखें भी धुंधली हो चुकी होतीं, वे भी लड़ते लड़ते मृत्यु का आलिंगन करते थे। उन्हें तो रेप का भय नहीं था, फिर वे क्यों प्राण दे देते थे?
दरअसल एक दूसरे को बौद्धिक कह कर पीठ थपथपाने वाले ये जाहिल समझ ही नहीं सकेंगे कि किसी में मातृभूमि के लिए लड़ते रहने की ऐसी जिद्द भी हो सकती है कि प्रत्यक्ष मृत्यु देख कर भी उनका लड़ना न छूटे, वे समर्पण न करें।
वे लड़ते थे ताकि लोग मना सकें होली दिवाली… बच्चे खेल सकें मेले में झूले का खेल, बेटियां सावन में झूल सकें झूला, गा सकें कजरी… हल जोतते पुरुषों के आल्हा की तान टकरा सके जांत चला रही स्त्रियों के झूमर की तान से… वे लड़े ताकि गुलाम बना कर अरब न भेज दिए जाएं सभी बुनकर, कुम्हार, कलाकार… यौन दासी न बनाई जाएं स्त्रियां…
आप मुगलकाल के किसी भी दरबारी लेखक की पुस्तक पढ़िए, वे जीते गए युद्धों के बारे में लिखते समय गर्व के साथ बताते हैं कि युद्ध के बाद इतनी स्त्रियां हाथ लगीं। उनमें से सुंदर स्त्रियां बड़े अधिकारियों में बांटी गई, कम सुंदर छोटे सिपाहियों में और बूढ़ी महिलाओं को मार दिया गया… क्या जीवन भर किसी क्रूर बर्बर गिरोह की यौन दासी बन कर रहना सचमुच भयावह नहीं है?
पुरानी बातें छोड़ दीजिए, गाजा के आतंकियों की कैद से छूटी किसी इजराइली लड़की का इंटरव्यू सुन लीजिये, सीरिया में बंधक बनी ईसाई लड़कियों में किसी का अनुभव पढ़ लीजिये, आपको लगने लगेगा कि उस यातना से मरना बेहतर था। तो जब आज यह स्थिति हैं तब क्या स्थिति रही होगी?
जौहर को रेप के भय से उठाया गया कायर कदम बताने वाले वे लोग हैं जिन्होंने अकादमिक मठाधीशों की अपने ऊपर एक दृष्टि भर पा लेने के लोभ में अपने स्वाभिमान की बत्ती बना ली है। यकीनन ना ये जौहर समझ पाएंगे, ना साका…


