नाबालिग लड़कियों को जिस्मफरोशी के जाल में धकेलने का टूल बना इंस्टाग्राम..??
‘‘बहुत प्यारी लग रही हो.. मॉडल बनोगी?’’ से शुरू होता है खेल, फर्जी प्रोफाइल से बिछाया जाता है बड़े सपनों का जाल
नई दिल्ली। सोशल मीडिया आज प्रतिभा और पहचान बनाने का बड़ा मंच है, लेकिन इसी मंच का इस्तेमाल नाबालिग लड़कियों को अपराध और शोषण के दलदल में धकेलने के लिए भी किए जाने के आरोप सामने आते रहे हैं। खासकर इंस्टाग्राम पर मॉडलिंग, ब्रांड शूट, म्यूजिक वीडियो और ग्लैमर की दुनिया में अवसर दिलाने के नाम पर कम उम्र की लड़कियों को निशाना बनाए जाने की आशंका गंभीर चिंता पैदा करती है।
“बहुत प्यारी लग रही हो.. तुम तो एकदम मॉडल हो”, “डीएम करो, ब्रांड शूट दिलवाता हूं” जैसे कमेंट किसी 13 या 14 साल की लड़की के लिए महज तारीफ नहीं, बल्कि किसी बड़े खतरे की शुरुआत भी हो सकते हैं। कमेंट सेक्शन से शुरू होने वाला यह संपर्क धीरे-धीरे निजी संदेशों तक पहुंचता है और फिर बड़े सपनों का ऐसा जाल बुना जाता है, जिससे निकलना मुश्किल हो जाता है।
फर्जी पहचान से शुरू होती है ‘ग्रूमिंग’
बताया जाता है कि ऐसे मामलों में अपराधी खुद को टैलेंट मैनेजर, मॉडलिंग एजेंट, फोटोग्राफर, म्यूजिक प्रोड्यूसर या ब्रांड प्रतिनिधि बताकर फर्जी प्रोफाइल तैयार करते हैं। पहले लड़की की तस्वीरों और पोस्ट पर तारीफ की जाती है। फिर मॉडलिंग या शूट का ऑफर देकर भरोसा जीतने की कोशिश होती है।
इसके बाद बातचीत सार्वजनिक कमेंट से निकलकर डीएम, निजी चैट और कभी-कभी दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म तक पहुंच जाती है। यहीं से शुरू होती है असली ‘ग्रूमिंग’, जिसमें नाबालिग को धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से प्रभावित कर उसकी सीमाएं कमजोर करने का प्रयास किया जाता है।
बड़े सपने, फिर शोषण का जाल
मॉडलिंग, फिल्म, म्यूजिक वीडियो और ग्लैमर की दुनिया में पहचान बनाने का सपना दिखाकर पहले भरोसा हासिल किया जाता है। इसके बाद मिलने, निजी तस्वीरें भेजने या किसी तथाकथित शूट के लिए बुलाने जैसे दबाव बनाए जा सकते हैं। कई मामलों में यही प्रक्रिया आगे चलकर यौन शोषण, ब्लैकमेल और मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों का रास्ता बन सकती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नाबालिग उम्र में बच्चे अक्सर यह पहचान नहीं पाते कि सामने वाला वास्तव में कौन है और उसकी असली मंशा क्या है।
इंस्टाग्राम कठघरे में, सवाल सुरक्षा व्यवस्था पर
सवाल सिर्फ इंस्टाग्राम के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि इस बात का है कि नाबालिगों तक पहुंच बनाने वाले फर्जी अकाउंट और संदिग्ध गतिविधियों को कितनी जल्दी पहचाना और रोका जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र सत्यापन, संदिग्ध खातों की निगरानी और बच्चों को ऑनलाइन ग्रूमिंग से बचाने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह भी गंभीर सवाल है।
एक लाइक, एक कमेंट और एक डीएम से शुरू होने वाला संपर्क कब अपराधियों के जाल में बदल जाए, कहना मुश्किल है। इसलिए अभिभावकों और बच्चों दोनों को सोशल मीडिया पर अनजान लोगों के संपर्क, मॉडलिंग या ब्रांड शूट के अचानक मिलने वाले ऑफर और निजी तस्वीरों की मांग को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
क्योंकि हर चमकता हुआ ऑफर अवसर नहीं होता, कुछ ऑफर अपराध की दुनिया का दरवाजा भी हो सकते हैं।

