अमित सिंघल : भारत की नीति और बदलते संकेत
पड़ोस के गृह मंत्री ने एक सम्बोधन में स्वीकार किया है कि “यह सिस्टम जिसके अंदर वे रह रहे है, वह कोलैप्स कर (ढह) चुका है आप माने, ना माने।”
एक-दो दिन पूर्व उसी पड़ोस के रक्षा मंत्री ने कहा कि वे पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के प्रदर्शनकारियों को भारत की श्रेणी में रखते है और “उन्हें भी भारत की तरह ही शत्रु मानते है।”
क्या कभी भी भारत के नेतृत्व से ऐसी भाषा सुनने को मिली है? एक बार अनुराग ठाकुर ने केवल यह कहा था कि देश के गद्दारो को —, वाक्य भी पूरा नहीं किया था। उस पर इतना शोर मच गया।
मैंने सोचा कि अगर वह अपना वाक्य कम्पलीट करते तो निश्चित रूप से कहते कि — गले लगाओ दुलारो को।
देश के गद्दारो को,
गले लगाओ दुलारो को।
आखिरकार भारत के विपक्ष की यही परंपरा रही है। गाँधी जी राष्ट्रपिता जो है। संभव है सत्तापक्ष भी यही कहता। लेकिन सत्तापक्ष से पूछा ही नहीं गया कि भैय्या, कहना क्या चाहते हो।
फिर भी, पड़ोस के दो टॉप मंत्री अगर यह कह रहे है तो स्थिति वास्तव में गंभीर है।
विशेषज्ञ डॉक्टर डोवाल के पास दवा और दारु दोनों है, लेकिन रोगी स्वैच्छा से लेगा नहीं। डॉक्टर डोवाल जबरन मुंह में दवा ठूंस रहे है, लेकिन इससे सीमित प्रभाव मिलता है। कई वायरस मर जाते है, लेकिन खतरनाक वायरस कहीं छुपे रहते है।
ऊपर से मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट डॉक्टर मोदी ऑपरेशन करके पीड़ित अंग काटने को तैयार बैठे है जिससे बाकी का सिस्टम ठीक हो जाए।
मेरा मानना है कि रोगी को भारत की मेडिकल एक्सपर्टीज की छत्रछाया में आ ही जाना चाहिए – चाहे वह डॉक्टर डोवाल की हो या डॉक्टर मोदी की।
कब तक काँखते-कराहते रहोगे?
नहीं तो कुछ वर्ष में फिर डॉक्टर शाह या डाक्टर योगी मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट हो जायेंगे। दोनों अक्खड़ है, बिना एनेस्थीसिया के (बिना बेहोश किये) ऑपरेशन करके दिल-किडनी-फेफड़ा-आँख निकाल लेते है।
फिर नहीं बचोगे।
जीवनदान के लिए उन कॉक्रोचो की तरफ देखना भी नहीं। वे रात्रि के समय अपने पैर को पंख पर घिसकर आवाज निकालते है जिससे मादा आकर्षित हो जाए; प्रणय लीला में व्यस्त रहते है।
वे तुम्हे क्या बचाएंगे।
उनको तो चीनी वैसे ही तलकर खा जाते है।


