मोदी सरकार में अमृत सरोवर, देश के प्रत्येक जिले में 75 जलस्रोतों का निर्माण या पुनर्जीवन

अमृत सरोवर : गांवों की धरती पर लौटता पानी, लौटती आस

कभी गांवों की पहचान उसके कुओं, तालाबों और पोखरों से होती थी। बरसात का पानी तालाबों में ठहरता था और वही पानी गर्मियों में खेतों, पशुओं और गांव की जिंदगी का सहारा बनता था। समय बदला, तालाब सिकुड़ते गए और भूजल का संकट गहराता गया। ऐसे दौर में ‘मिशन अमृत सरोवर’ केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि गांवों में पारंपरिक जल-संस्कृति को फिर से जीवित करने की कोशिश बनकर सामने आया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल 2022 को मिशन अमृत सरोवर की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य देश के प्रत्येक जिले में कम से कम 75 जलस्रोतों का निर्माण या पुनर्जीवन करना था। मूल लक्ष्य 15 अगस्त 2023 तक 50 हजार अमृत सरोवर तैयार करने का था, लेकिन लक्ष्य समय से पहले ही हासिल हो गया।

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आज इस अभियान का विस्तार मूल लक्ष्य से कहीं आगे निकल चुका है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2026 तक देश में लगभग 69 हजार अमृत सरोवरों का निर्माण या पुनर्जीवन किया जा चुका है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे जलस्रोतों की है, जिन्हें नया जीवन दिया गया है।

सरोवर यानी सिर्फ पानी नहीं

एक अमृत सरोवर सामान्य तालाब से कुछ अधिक व्यापक सोच का हिस्सा है। इसके लिए कम से कम एक एकड़ क्षेत्रफल और लगभग 10 हजार घन मीटर जलधारण क्षमता का मानक रखा गया है। इसका उद्देश्य वर्षा के पानी को रोकना, सतही जल उपलब्धता बढ़ाना और भूजल पुनर्भरण को मजबूत करना है।

तालाब में जमा पानी केवल आंखों को अच्छा लगने वाला जल नहीं है। यह जमीन के भीतर उतरकर भूजल का भंडार बढ़ाने में मदद करता है। यही पानी आगे चलकर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी बन सकता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार टैंकों, तालाबों और जल संरक्षण संरचनाओं से होने वाला भूजल पुनर्भरण 2017 में 13.98 बिलियन घन मीटर से बढ़कर 2024 में 25.34 बिलियन घन मीटर हुआ है।

अमृत सरोवर से रोजगार भी

इस अभियान की खूबसूरती यह है कि इसका लक्ष्य केवल पानी रोकना नहीं है। इन जलस्रोतों का उपयोग सिंचाई, मत्स्य पालन और अन्य ग्रामीण आजीविका गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।

यानी एक तालाब खेत को पानी दे सकता है, पशुओं की प्यास बुझा सकता है, भूजल बढ़ा सकता है और किसी ग्रामीण परिवार के लिए मछली पालन के जरिए आय का साधन भी बन सकता है।

इसी दिशा में अब अमृत सरोवरों को मत्स्य क्षेत्र से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे मछुआरों, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण सहकारी संस्थाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

जनभागीदारी इसकी असली ताकत

अमृत सरोवर की सफलता केवल सरकारी मशीनरी से तय नहीं होगी। तालाब बना देना आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक जीवित रखना बड़ी चुनौती है।

इसलिए मिशन में जनभागीदारी को केंद्र में रखा गया है। सरकारी जानकारी के अनुसार हजारों जलस्रोतों के लिए स्थानीय उपयोगकर्ता समूह बनाए गए हैं, जो सरोवर के विकास, उपयोग और रखरखाव में भूमिका निभाते हैं।

सरोवरों के आसपास नीम, पीपल, बरगद और अन्य देशी प्रजातियों के पौधे लगाने का भी प्रावधान है। मिशन के माध्यम से 23 लाख से अधिक पौधे लगाए जाने की जानकारी सरकार ने दी है।

असल परीक्षा अब रखरखाव की है

अमृत सरोवर योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी संख्या नहीं, बल्कि इन सरोवरों का स्थायी उपयोग होना होगा।

कहीं तालाब बनाकर छोड़ दिया गया, उसमें गाद भर गई, जलग्रहण क्षेत्र पर अतिक्रमण हो गया या पानी आने का रास्ता बंद हो गया, तो करोड़ों की मेहनत फिर बेकार हो सकती है।

इसलिए जरूरत है कि प्रत्येक अमृत सरोवर को गांव की साझा संपत्ति माना जाए। उसकी नियमित सफाई हो, जलग्रहण क्षेत्र सुरक्षित रहे, पौधों की देखभाल हो और स्थानीय समुदाय उसके रखरखाव की जिम्मेदारी निभाए।

पानी बचाना ही भविष्य बचाना है

भारत में जल संकट आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे में अमृत सरोवर जैसे अभियान हमें हमारी पुरानी जल परंपरा की ओर भी लौटाते हैं और आधुनिक तकनीक से उसे नया रूप भी देते हैं।

लगभग 69 हजार अमृत सरोवर केवल एक आंकड़ा नहीं हैं। ये 69 हजार संभावनाएं हैं, जहां बारिश का पानी रुक सकता है, जमीन फिर सांस ले सकती है, खेतों को सहारा मिल सकता है और गांव की अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिल सकती है।

कहना गलत नहीं होगा कि,

“तालाब में सिर्फ पानी नहीं भरता,
तालाब भरता है तो गांव की उम्मीद भरती है।
भूजल बढ़ता है तो किसान का भरोसा बढ़ता है,
और पानी बचता है तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचता है।”

यही अमृत सरोवर की असली कहानी है।

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