प्रसिद्ध पातकी : भगवान कृष्ण और दादा भीष्म के बीच समान रहा आठ का चक्कर

महाभारत के एक पात्र हैं। हम सभी के प्रिय। हम सभी के श्रद्धा के पात्र। टीका-टिप्पणीकारों ने इनके बारे में जाने क्या-क्या बात कही किंतु इनका सम्मान और प्रियता में रत्ती मात्र की कमी नहीं आ पायी। और क्या गजब बात है कि इन्हीं के मुखारबिन्दु से विष्णु सहस्रनाम सामने आया।
जी हाँ, हम दादा भीष्म की बात कर रहे हैं। यह गजब के योद्धा थे किंतु उससे भी बड़े भक्त। अरे जो साक्षात् वासुदेव को उनकी प्रतिज्ञा भंग करने के लिए विवश कर दे, वह भला क्या सामान्य व्यक्ति होगा? कुछ लोग इस प्रसंग में भगवान की महानता बताते हैं। बात ठीक है, किंतु हम जैसे लोग तो इस मामले में भीष्म दादा के साथ हैं और मानते हैं कि यह उन्हीं की भक्ति का प्रताप है कि श्रीहरि को झुकना पड़ा।


भगवान कृष्ण भी कहीं न कहीं भीष्म दादा के प्रति मन में गहरा सम्मान रखते थे। देखा जाए तो देवकीनन्दन और गंगापुत्र भीष्म में एक समानता है। यह समानता उनके जन्म की है। दोनों अपनी जननी की आठवीं संतान थे। दोनों, के जन्म से पहले उनके सात सहोदरों की जीवन लीला विभिन्न कारणों से खिलने से पहले ही मुरझा गयी थी।
विष्णु सहस्रनाम में आता है :-

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वसुर्वसुमना: सत्य: समात्मा सम्मित: सम:।
अमोघ: पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृति:।।

यह जो वसु हैं, यह भगवान कृष्ण भी हैं और भीष्म भी हैं। भगवान नारायण वसु इसलिए हैं कि वे सभी प्राणियों में निवास करते हैं। इसका यह भी अर्थ है कि सभी प्राणी उनमें निवास करते हैं। इसके अलावा भगवान का एक अन्य नाम है वसुमना। भगवान वसुमना इसलिए हैं क्योंकि उनके संकल्प से ही सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। हमारे भीष्म दादा एकांत में बैठकर श्रीहरि का का स्मरण करते रहे, इसलिए उनका मन ‘वसुमना’ हो गया।
भीष्म दादा और भगवान देवकी नन्दन के जन्म की बात को आगे बढ़ाते हैं। कृष्ण जन्म की कथा तो हम सभी जानते हैं। पर भीष्म दादा भी अपनी माँ की आठवीं संतान थे। कथा आती है कि आठ वसु थे। इनमें से प्रभास नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की नन्दिनी गाय चुरा ली। वशिष्ठ ऋषि को जब यह पता चला तो उन्होंने आठों वसुओं को शाप दिया कि तुम्हें मनुष्य की तरह जन्म लेना पड़ेगा और उन्हीं की तरह तुम्हारी मृत्यु होगी। इन वसुओं ने ऋषि के बहुत हाथ जोड़े तो उन्होंने सातों वसुओं से कहा कि मनुष्य के रूप में उनका जन्म तो अवश्य होगा किंतु उनका जीवन लम्बा नहीं होगा। किंतु जिस प्रभास नामक ऋषि ने नन्दिनी चुरायी थी, उसे मनुष्य के रूप में लम्बा जीवन व्यतीत करना पड़ेगा।
शांतनु और गंगा का जब विवाह हुआ तो गंगाजी ने उनसे यह वर मांगा कि उनकी जो भी संतान होगी, उसके बारे में शांतनु कोई पूछताछ नहीं करेंगे। इन दंपति के एक के बाद एक सात संतान हुई, जिन्हें गंगाजी जल में बहा देती थीं। हर बार शांतनु के हृदय पर तो मानों भारी शिला रख दी जाती थी। आठवीं संतान होने पर शांतनु अपने को रोक नहीं पाये। इसलिए गंगाजी अपनी आठवीं संतान को राजा शंतनु के पास छोड़कर चली गयीं और यही संतान बाद में भीष्म पितामह बने।
अब भगवान कृष्ण और दादा भीष्म, दोनों के साथ आठ अंक जुड़ गया। यह अंक बहुत ही रहस्यमय, चुनौतीपूर्ण और जीवन में बहुत सारे संघर्ष देता है। दोनों के जीवन में यह सब लगा ही रहा। जीवन के तमाम पक्षों के बावजूद यह दोनों ही हम सभी के अत्यंत प्रिय हैं। हम इन्हें अपने से कभी अलग नहीं कर पाते है। पुरुषोत्तम मास में भगवान ही नहीं उनके परम प्रिय भक्त दादा भीष्म का स्मरण निश्चित ही हम सभी के भीतर भक्ति का उन्मेष करे।

एकादशी की राम राम

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