परख सक्सेना : लगे रहो अन्नामलाई..

पिछली लेख मे ज़ब लिखा कि भारत अब वन पार्टी रुल मे आ चुका है तो कई लोगो के विपरीत मत थे।

बीजेपी के बाद कांग्रेस ही दूसरी बड़ी पार्टी है ये तो निर्विवाद है, लेकिन कितनी बड़ी? 543 लोकसभा सीटों मे 249 सीटें सिर्फ पाँच बड़े राज्यों से आती है, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार और तमिलनाडु। अपने दिल से पूछिए कांग्रेस का कितने राज्यों मे कितना अस्तित्व है?

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कांग्रेस इन पाँच राज्यों मे अपनी दम पर बहुत अच्छा भी कर ले तो 15 सीटें बहुत है। 2024 वाले गणित का जवाब भी आगे मिलेगा। मगर यदि नए गणित से देखे तो कांग्रेस के पास अब स्कोप 300 सीटों के इर्द गिर्द रह जाता है। इसके बाद गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की 66 सीटों मे कांग्रेस लगभग शून्य है।

सिर्फ इन्ही 8 राज्यों को यदि ले लिया जाए तो कांग्रेस के पास 250 से ज्यादा सीटों पर तो कोई अवसर भी नहीं है। जबकि इन्ही 300 सीटों पर बीजेपी का औसत 250 का है, अब यदि कांग्रेस को फिर भी सत्ता मे आना ही है तो शेष सभी सीटों पर उसे पूर्ण विजय चाहिए और बीजेपी हारनी चाहिए।

लेकिन शेष राज्यों मे उत्तरी भारत भी है, नॉर्थ ईस्ट मे हिमांता के साथ ही कांग्रेस समाप्त हो चुकी थी। तो फिर बचा क्या?

2024 की बात भी कर लेते है, कांग्रेस बकायदा उधार मांगकर चुनाव लड़ी। तमिलनाडु मे 9 और उत्तरप्रदेश मे 17 सीटों लायक कांग्रेस का क्या वोटर बेस था? ये भानुमति का कुनबा था जो ईंट और रोढ़े मांगकर जोड़ा गया था। ये राहुल गाँधी का वही प्रदर्शन था जो 1984 मे राजीव गाँधी का था, व्यक्तित्व से नहीं बस एक दुर्घटना से जीती सीटें है।

यही बात 2024 चुनाव के बाद भी लिखी थी मगर तब लोग भावनाओं मे ज्यादा सोच रहे थे। राहुल गाँधी एक ब्रांड लग रहा था, 240 सीटें कम लग रही थी, 99 तो ऐसा लग रहा था मानो राहुल ही शपथ लेगा। मगर आशा है अब आप इसका सही आंकलन कर पा रहे होंगे।

कांग्रेस के लिए अभी जीतना नहीं अस्तित्व बचाना आवश्यक है, पश्चिम बंगाल मे आज बीजेपी के सामने कोई दल नहीं है ऐसे मे बजाय ममता को पकड़ने के आप खुद को खड़ा क्यों नहीं करते? बीजेपी अपने कार्यकर्ताओ के खून का बदला ले रही है, आप बदला नहीं ले सकते लेकिन उनके साथ तो खडे हो जाइये।

कांग्रेस को फिर किसी महात्मा गाँधी की जरूरत है, कुछ ऐसे लोग चाहिए जो RSS के नेटवर्क का चक्रव्यूह तोड़कर जमीन से पार्टी को खड़ा कर सके। उसके लिए राहुल गाँधी को सड़क पर आना होगा, वो जो ओछे शॉर्ट कट ढूंढ रहा है उसके बजाय जनता के असली मुद्दे समझने होंगे।

भारत बहुत बड़ा देश है यहाँ जिले बदलते ही मुद्दे बदल जाते है इसीलिए RSS को इतना समय लग गया। आपको भी 30-40 साल देने होंगे जो कि एक वंशानुगत पार्टी के लिए असंभव है। RSS इसलिये सफल हुआ क्योंकि गुरु गोलवलकर या देवरस को अपने परिवार वालो को गद्दी नहीं देनी थी।

इस पूरे लेख मे अब भी कुछ छूट रहा है, विचारधारा! कांग्रेस के पास आज कोई विचारधारा नहीं है, देश आज़ाद हुआ तो विचारधारा थी लेकिन सोनिया युग आते आते बस राजनीति रह गयी। इसके विपरीत बीजेपी पहले राम मंदिर और कश्मीर जनता को बेच रही थी, अब विकसित भारत बेच रही है और कल को अपने कार्ट मे अखंड भारत भी जोड़ लेगी।

कांग्रेस के पास ऐसे मुद्दे ही नहीं है कि जनता को खींच सके, रोज ट्रैफिक लाइट तोड़ते व्यक्ति को लोकतंत्र या संविधान की कोई परवाह नहीं है आप उसे ज़बरदस्ती बेच रहे हो।

यही कुछ बाते है कि कांग्रेस अब फिर से नहीं उठ सकती और बीजेपी का वन पार्टी रुल अभी कई वर्षो तक चलेगा। वो अलग बात है कि बीजेपी कोई बड़ा घोटाला कर दे, या फिर भारत उसके नेतृत्व मे कोई युद्ध हार जाए। हालांकि भारत मे युद्ध सत्ता पक्ष के लिए वरदान सिद्ध होता है।

इस समय सिर्फ दो ही नेता है जो बीजेपी का विकल्प बन सकते है, एक नवीन पटनायक दूसरे चंद्रबाबू नायडू। लोकतंत्र का दुर्भाग्य यह है कि नवीन बाबू कभी वाजपेयी और मोदी की तरह मास लीडर नहीं बन सके और नायडू भाषायी ज्ञान के चलते तेलुगु क्षेत्र से नहीं निकले। आयु भी एक बड़ा तत्व तो है।

हालांकि के अन्नामलाई बीजेपी से अलग हुए है, उनके अंदर भारत का एक भविष्य दिखता है हालांकि अभी बहुत काम करना है। वैसे भी बीजेपी से बागी हुए नेता या तो वापस लौटकर आते है या फिर अदृश्य हो जाते है। ईश्वर करें अन्नामलाई बीजेपी से बड़ी पार्टी बनाये और ज्यादा कट्टर हिन्दू साबित हो।

अन्नामलाई की राह कठिन है मगर शुरुआत तो ऐसे ही होती है, 1952 मे बीजेपी को 3 सीटें मिली थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी या गुरु गोलवलकर ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि कभी 240 सीटें भी जीतेंगे जो भी लोगो को कम लगेगी। लगे रहो अन्नामलाई, वापस बीजेपी मे विलय करो या नयी बीजेपी खड़ी करके दिखाओ। दोनों स्थिति मे हमारा तो समर्थन है।

✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi

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