प्रसिद्ध पातकी : राम में रमना ही विराम है, विश्राम है
यह सारी सृष्टि लगातार चली जा रही है। कहीं कोलाहल के साथ। कहीं शांति के साथ। निरंतर चलते रहने के कारण थमने और विश्राम करने का अपना एक अलग आनन्द है। हर चलती चीज एक दिन थमती है। एक दिन उस पर विराम लगता है।

यह जो विराम शब्द है, यह भी काफी अर्थवान है क्योंकि भगवान विष्णु के सहस्र नामों में यह सम्मिलित है। विष्णु सहस्रनाम में आता है:-
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।।
भगवान विराम है। अब जिस भी शब्द या संज्ञा में राम नाम जुड़ जाए, उसकी बात अपने आप में विशिष्ट हो जाती है। विराम में राम है और विशिष्ट तरह के राम हैं।
कहते हैं कि काशी में मरण से मुक्ति मुक्ति मिलती है। इसके पीछे यह मान्यता है कि काशी में जो भी प्राण छोड़ता है, महादेव बाबा उसके कान में तारक मन्त्र सुनाकर उसे मुक्ति दे देते हैं। अब यह तारक मन्त्र क्या है? भगवान राम का नाम ही तारक मन्त्र है।
व्याकरण में विराम शब्द, थमने या ठहरने का संकेत होता है। बात कहते में थोड़ी देर के लिए थमने पर अल्प विराम और वाक्य पूरा होने पर पूर्ण विराम लगाया जाता है। किंतु जन्म जन्मातंर मानने वाले हम आस्तिक लोग जीवन का अंत नहीं विराम मानते हैं। ईश्वर यदि आदि और अनंत है तो जीव भी निरंतर गति कर रहा है।
संस्कृत में यदि विराम शब्द पर विचार किया जाए तो इसका एक अर्थ विशिष्ट रूप में रमना है। महादेव बाबा ने जब आपको अंतिम समय में तारक मन्त्र दिया तो आपकी यात्रा न तो थमी और न रुकी। यह बस विशिष्ट रूप से रम गयी।
जो व्यक्ति जीवन में राम रूपी शब्द में रमना सीख गये, उनके लिए विराम एक उत्सव में बदल जाता है। हम वैष्णव लोग इसी लिए वैकुण्ठोत्सव मनाते हैं। हमारा मानना है कि जीव भगवान में रम गया।
मेरे एक परिचित थे। वे कहते थे कि व्यक्ति जन्म के साथ ही अपनी आयु लिखवा कर लाता है। किंतु व्यक्ति जब भगवान का हृदय से स्मरण, नाम या मन्त्र जप करता है, ध्यान लगाता है, तन्मय होकर कीर्तन करता है तो उतना समय आपकी लिखी हुई आयु में काउंट नहीं होता। यानी भगवान के स्मरण, कीर्तन, जप, ध्यान आदि के समय आपकी आयु पर विराम लग जाता है। आपको यह कृपांक यानी ग्रेस प्वांइट मिल जाते हैं।
प्रभु के स्मरण में रमना ही विराम है। यह बात यदि मन में अच्छी तरह उतर जाए तो बस कल्याण ही हो सकता है। मन को जब आप राम रूपी लक्ष्य में रमाना शुरू कर देते हैं तो आप ‘‘विरत’ हो जाते हैं। अपने आप सांसारिक विषयों से हटने लगते हैं। यह सब राम नाम की महिमा और प्रसाद है।
एकादशी की राम राम
(हमारे जन्म स्थल तीर्थराज प्रयाग के नगर देवता हैं–वेणी माधव। उनकी छवि अद्भुत है।
राम में रमना ही विराम है, विश्राम है
यह सारी सृष्टि लगातार चली जा रही है। कहीं कोलाहल के साथ। कहीं शांति के साथ। निरंतर चलते रहने के कारण थमने और विश्राम करने का अपना एक अलग आनन्द है। हर चलती चीज एक दिन थमती है। एक दिन उस पर विराम लगता है।
यह जो विराम शब्द है, यह भी काफी अर्थवान है क्योंकि भगवान विष्णु के सहस्र नामों में यह सम्मिलित है। विष्णु सहस्रनाम में आता है:-
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।।
भगवान विराम है। अब जिस भी शब्द या संज्ञा में राम नाम जुड़ जाए, उसकी बात अपने आप में विशिष्ट हो जाती है। विराम में राम है और विशिष्ट तरह के राम हैं।
कहते हैं कि काशी में मरण से मुक्ति मुक्ति मिलती है। इसके पीछे यह मान्यता है कि काशी में जो भी प्राण छोड़ता है, महादेव बाबा उसके कान में तारक मन्त्र सुनाकर उसे मुक्ति दे देते हैं। अब यह तारक मन्त्र क्या है? भगवान राम का नाम ही तारक मन्त्र है।
व्याकरण में विराम शब्द, थमने या ठहरने का संकेत होता है। बात कहते में थोड़ी देर के लिए थमने पर अल्प विराम और वाक्य पूरा होने पर पूर्ण विराम लगाया जाता है। किंतु जन्म जन्मातंर मानने वाले हम आस्तिक लोग जीवन का अंत नहीं विराम मानते हैं। ईश्वर यदि आदि और अनंत है तो जीव भी निरंतर गति कर रहा है।
संस्कृत में यदि विराम शब्द पर विचार किया जाए तो इसका एक अर्थ विशिष्ट रूप में रमना है। महादेव बाबा ने जब आपको अंतिम समय में तारक मन्त्र दिया तो आपकी यात्रा न तो थमी और न रुकी। यह बस विशिष्ट रूप से रम गयी।
जो व्यक्ति जीवन में राम रूपी शब्द में रमना सीख गये, उनके लिए विराम एक उत्सव में बदल जाता है। हम वैष्णव लोग इसी लिए वैकुण्ठोत्सव मनाते हैं। हमारा मानना है कि जीव भगवान में रम गया।
मेरे एक परिचित थे। वे कहते थे कि व्यक्ति जन्म के साथ ही अपनी आयु लिखवा कर लाता है। किंतु व्यक्ति जब भगवान का हृदय से स्मरण, नाम या मन्त्र जप करता है, ध्यान लगाता है, तन्मय होकर कीर्तन करता है तो उतना समय आपकी लिखी हुई आयु में काउंट नहीं होता। यानी भगवान के स्मरण, कीर्तन, जप, ध्यान आदि के समय आपकी आयु पर विराम लग जाता है। आपको यह कृपांक यानी ग्रेस प्वांइट मिल जाते हैं।
प्रभु के स्मरण में रमना ही विराम है। यह बात यदि मन में अच्छी तरह उतर जाए तो बस कल्याण ही हो सकता है। मन को जब आप राम रूपी लक्ष्य में रमाना शुरू कर देते हैं तो आप ‘‘विरत’ हो जाते हैं। अपने आप सांसारिक विषयों से हटने लगते हैं। यह सब राम नाम की महिमा और प्रसाद है।
एकादशी की राम राम
(हमारे जन्म स्थल तीर्थराज प्रयाग के नगर देवता हैं–वेणी माधव। उनकी छवि अद्भुत है। तस्वीर इंटरनेट से साभार।)


