अमित सिंघल : जनता का धन, सत्ता का वैभव और विकास की राजनीति


स्वतंत्रता के बाद शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें। अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे से और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया।

राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका (कुछ वर्ष छोड़कर) भारत में कभी भी निजी आवास में नहीं रहे। वे हमेशा सरकारी कोठियो में रहे है। यह है अभिजात वर्ग के द्वारा व्यवस्था का शोषण और गरीबो के पैसे पे ऐश।

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कैसे आप के घर में बिजली, पानी, गैस ना आये, जबकि अभिजात वर्ग स्विमिंग पूल में नहाये, सेंट्रल AC में रहे।

जब आपके घर में बिजली नहीं आती, आपका कंप्यूटर एकाएक बंद हो जाए, और आपके बच्चे या आप उस पर काम ना कर पाए, उसका लाभ-हानि का हिसाब कौन निकालकर रखेगा? कैसे आप विदेशों में रहने वाले बच्चों या वहां के व्यवसाय से मुकाबला करेंगे जब उनके यहां चौबीसों घंटे बिजली बिना फ्लक्चुएशन के आती है।

इसी प्रकार की बाधाएं उद्यम लगाने में, सफर करने में, कोई इन्नोवेशन करने में, इलाज करवाने में, हर जगह पर रोड़े लगा दिया गए जिससे आप किसी न किसी समस्या में उलझे रहे। आपका सीमित बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, घूस और समय बर्बादी में लगता रहे। आप 500 किलोमीटर की यात्रा ट्रेन या कार या बस से 12-14 घंटे में करेंगे, जबकि वही अभिजात वर्ग हवाई यात्रा करके 1 घंटे में पहुंच जाएंगे।

क्या उन 11 घंटों की कोई कीमत नहीं है? क्या उन 11 घंटों को आप किसी सार्थक कार्य के लिए प्रयोग नहीं कर सकते थे? कही आप उन 11 घंटों का प्रयोग व्यवस्था को चुनौती देने में तो नहीं लगा देंगे? इसी प्रकार से आपके घंटे और पैसे किसी न किसी समस्या और क्यू में उलझा दिया गया।

तभी उन्हें शिकायत है कि गंगा एक्सप्रेस वे से जनता का 5 घंटा समय बचेगा और पूछते है कि जनता इस बचे हुए समय का क्या करेगी?

लेकिन यह नहीं पूछेंगे कि इस 5 घंटे में वह कार, टैक्सी, बस, ट्रक क्या करेगी? क्या इस पूंजीगत निवेश का सदुपयोग किसी अन्य ट्रिप के लिए नहीं किया जाएगा? क्या इस बचे हुए समय का धन अर्जित करने के, अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराने में नहीं प्रयोग नहीं होगा?

ऐसे ही भारत के बंदरगाह पर एक शिप के बंदरगाह पहुंचने के बाद 0.9 दिनों या 22 घंटे में एक कंटेनर शिप से माल उतार कर, उसमे एक्सपोर्ट का माल लोड करके, शिप को अगली यात्रा के लिए रवाना कर देता है। इस प्रक्रिया को ship turnaround time कहा जाता है। पहले इसमें औसतन 4 दिन लगता था।

अतः, स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछा जा सकता है कि शिप इस तीन दिन की बचत का क्या करेंगे?

अपने छात्र जीवन में मैं गर्मी के समय तीन घंटे रेलवे रिजर्वेशन की लाइन में लगकर टिकट बुक करवाता था। प्रयागराज में तीन घंटे में बिजली का बिल जमा होता था। बैंक ड्राफ्ट के लिए लाइन में लगता था, 3 – 4 काउंटर से साइन करवाना होता था। फिर ड्राफ्ट एक-दो दिन बाद मिलता था।

क्या यह मेरे समय का सदुपयोग था?

इस समय का सदुपयोग के लिए भारत की राजनैतिक और आर्थिक संरचना को ही बदला जा रहा है।

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