परख सक्सेना : ऑपरेशन लोट्स

ऑपरेशन लोटस उस जमाने मे शुरू हुआ था ज़ब लोटस भी नहीं था, बीजेपी का नाम जनसंघ था और कमल की जगह दीपक का चुनाव चिन्ह था।

1967 मे राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने मध्यप्रदेश मे डीपी मिश्रा की सरकार गिरा दी थी, उन दिनों एक तिहाई विधायक तोड़कर भी दल विरोधी कानून से बचा जा सकता था। 1975 मे यही ऑपरेशन लोटस गुजरात मे भी हुआ मगर आपातकाल लग गया और जनसंघ का दीप जलते जलते रह गया।

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वाजपेयी युग शुरू हुआ तो ऑपरेशन लोटस स्वतः स्थगित हो गया क्योंकि वाजपेयी जी तोड़फोड़ की राजनीति के सख्त खिलाफ थे। लेकिन वाजपेयी जी का दुर्भाग्य देखिए कि तोड़ फोड़ की राजनीति के सबसे बड़े शिकार भी वे ही बने, पहले इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी तुड़वाई फिर 1999 मे सोनिया गाँधी ने साम नाम, ऊंच नींच का प्रयोग करके एक वोट से सरकार गिरवा दी।

1999 मे ज़ब जयललिता ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लिया तो वाजपेयी सरकार अल्पमत मे आ गयी। DMK ने समर्थन दे भी दिया, हरियाणा के चौटाला भी बीजेपी के साथ हो गए लग रहा था कि वाजपेयी सरकार बच जायेगी। मगर अंत समय मे मायावती ने खेल बिगाड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और सैफुद्दीन जैसे लोग जो सरकार मे थे उन्होंने खंजर घोपा।

मर्यादाये तो तब पार हुई ज़ब उड़ीसा के नए नवेले मुख्यमंत्री भी वोट डालने पहुँच गए। इन्होने लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया था, गिरधर गमांग नाम था। वाजपेयी ने कहा भी कि नैतिकता मत छोड़िये मगर ये नेहरू की नहीं सोनिया की कांग्रेस थी, सोनिया गाँधी वाजपेयी पर हॅसती रही और चुनी हुई सरकार एक वोट से गिर गयी।

नीचता यही नहीं रुकी, सरकार गिरते ही कारगिल युद्ध हो गया। कांग्रेस को लगा कि इससे बीजेपी को फायदा होगा तो चुनाव आयोग ने चुनाव ही देरी से करवाये, इसमें आयरनी यह है कि तब के चुनाव आयुक्त ने बाद मे कांग्रेस ज्वाइन की और मनमोहन के समय तो मंत्री भी बने। आज चुनाव आयोग को रोती कांग्रेस कितनी अच्छी लगती है।

2005 मे वाजपेयी जी ने सन्यास ले लिया, इसके बाद RSS मे मोहन भागवत का युग शुरू हुआ। नितिन गडकरी दिल्ली भेजे गए और ऑपरेशन लोटस को फिर से शुरू किया गया, पहली रणभूमि कर्नाटक बना। कांग्रेस और जनता दल के विधायकों को तोड़कर बीजेपी मे लाया गया और सरकार मजबूत हुई।

2016 मे नीतीश कुमार तोड़े गए, हरियाणा मे चौटाला लाये गए, कश्मीर मे मुफ़्ती साथ आये और सबसे बड़ी क़ामयाबी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मे मिली ज़ब ज्योतिरादित्य सिंधिया और एकनाथ शिंदे तोड़े गए। गोवा और गुजरात मे भी ऑपरेशन लोटस चला और आज वक़्त का तकाजा देखिये कि सोनिया गाँधी खून के आंसू रो रही है।

कोई बहुत बड़ी बात नहीं है यदि कांग्रेस के भी सांसद टूट जाए, इस बार अमित शाह को बस इतना बोलने की देर है कि हम संभाल लेंगे आप अपनी अंतर्रात्मा को सुनो। सांसद तोड़ने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और आपके प्रस्तावो पर कांग्रेस का समर्थन आता रहेगा। कांग्रेस मे सिर्फ गाँधी ही रह जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है।

गिरधर गमांग जिसने वाजपेयी सरकार गिराई थी वो तक बीजेपी मे घुसने की कोशिश कर चुका है, 2015 मे गमांग ने अमित शाह को मक्खन लगाते हुए कहा था कि मै तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशंसक हूँ। बेशर्मी की हद देखते हुए आप यह भी गौर करे कि कांग्रेस मे कितने बड़े बड़े चाटुकार भरे हुए है।

खैर जो काम तब कांग्रेस ने किया था वही आज बीजेपी ने किया, गलत वो भी थे गलत ये भी है। बस कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा नहीं थी कैसे सोनिया और राहुल सत्ता मे रहे वो इसी मे लगे थे इसके विपरीत बीजेपी के पास हिन्दुराष्ट्र और अखंड भारत का लक्ष्य है। अभी वाले नहीं करेंगे तो अगले वाले करेंगे इसलिए हम बीजेपी के साथ है।

लेकिन बीजेपी भी आग से खेल रही है, तानाशाही ही पतन का कारण बनती है। बड़े नेताओं पर नहीं मगर हर 10 साल मे अपने विधायक और सांसद बदलते रहिये, जनता को मोदी शाह नहीं ये विधायक और इनके छुठभैये परेशान करेंगे जो खुद को किसी राजा से कम नहीं समझते।

✍️परख सक्सेना✍️
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