परख सक्सेना : धर्मेंद्र प्रधान.. दबाव के आगे झुकना या बड़ी रणनीति?
परख सक्सेना : इस्तीफा गलत था, इसकी जरूरत नहीं थी। छात्र वैसे भी वापस लौट रहे थे और सिर्फ दंगाई बच गए थे जिन्हे अब भी आप घसीट घसीट कर ही पीटोगे। आडवाणी ने ज़ब इस्तीफ़ा दिया था तो उनका करियर खत्म हो गया था तब ही से ये एक राजनीतिक सीख बन गया कि सरकार पर जितना कम डेंट पड़े उतना ठीक। मोदी सरकार मे ये पहला इस्तीफ़ा हुआ है जो किसी दबाव के फलस्वरूप आया है। FCRA लागू करवाना ज्यादा बड़ी प्राथमिकता है या वो संविधान संशोधन बिल पारित करवाना जो इस उन्माद की वजह से नहीं हो पा रहे थे। प्रधान को शहीद करके राम मंदिर का मुद्दा बचा ले गए या नितिन गडकरी को, भगवान जाने क्या सच था। 20 जुलाई को दबाव था, 22 को सबसे ज्यादा था लेकिन आज तो सबसे कम था और लगातार घट ही रहा था। एक कारण भी ऐसा नहीं था कि धर्मेंद्र प्रधान को आगे आना पड़ा, ये बेवजह का सिरदर्द है जो सरकार ने मोल ले लिया हालांकि कॉकरोच ने भी आंदोलन का समापन कर दिया है। यदि यहाँ डेंट पड़ा तो वहाँ अभिजीत दीपके का करियर शुरू होते ही खत्म हो गया। अब इस्तीफ़ा आ गया है तो जहाँ जहाँ आंदोलन हो रहे थे वहाँ से छात्रों को पीछे होने दीजिये और क्रेक डाउन कीजिये दंगाईयों पर। जो जश्न मन रहा है उससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है, भूखो को 12 साल मे एक निवाला मिला है खाने दीजिये। लेकिन ये सुनिश्चित कीजिये कि इन्हे ये आखिरी निवाला मिला है, गैर भाजपाई राज्य सरकारों पर भी गाज गिराइये। हिमाचल और पंजाब तो अगले साल चुनाव मे है, कर्नाटक और झारखंड की खबर लेने का समय है। खासकर झारखंड एक सॉफ्ट टारगेट है, राजनीतिक रूप से ठंडा प्रदेश है। सरकार के पास वेतन देने को पैसे नहीं है, भ्रष्टाचार से जनता त्रस्त है। झारखंड मे आप जैसे को तैसा के तहत गृहयुद्ध का एक नमूना दिखा सकते है, लेकिन उससे भी बढ़कर है कि नया शिक्षा मंत्री सुधांशु त्रिवेदी जैसे व्यक्ति को बनाया जाए, इस तरह रोजे इन्ही के गले पड़ेंगे। बाकि धर्मेंद्र प्रधान के जाने का दुख तो नहीं मगर निराशा है लेकिन खुशी है कि ये कॉकरोच चैप्टर यही खत्म हुआ और जो तख्तापलट की साजिश थी उसका भी अंत हुआ। 12 साल मे पहली बार विपक्ष का कोई मुद्दा जनता के बीच गिरा मतलब कुछ जगह गड्ढे भरने पड़ेंगे। छवि की चिंता मत कीजिये वो तो 2024 के चुनाव मे भी प्रभावित हुई थी उससे भी पहले कई बार हुई है, पुनरावृति करूँगा अभी दो आईपीएल और एक वर्ल्डकप आएगा और NEET को लोग डूबते जहाज की तरह भूल जायेंगे। लेकिन जैसे आपने ममता और उद्धव का अंत किया वैसे ही अन्य क्षेत्रीय दलों का करते रहिये। इसे एक धक्के की तरह लीजिये क्योंकि आज तक धक्के ही मील का पत्थर बने है। 2024 वाली निराशा ही थी जिसने लालू, उद्धव, ममता का अंत किया, किसान आंदोलन की निराशा ने ग्रामीण वोट बेस बढ़ाया। ये वाली निराशा भी सकारात्मक परिवर्तन ही लायेगी, हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं है। एक सफल ऑपरेशन लोटस की जरूरत है और ये निराशा उत्साह मे बदल जायेगी।

