अमित सिंघल : मोदी विरोध बनाम जिम्मेदार राजनीति, विपक्ष की बड़ी

काक्रोच आंदोलन में राहुल एवं कजरी, दोनों के पास सुनहरा अवसर था जब वे अपनी क्रेडिबिलिटी को पुनः स्थापित कर सकते थे, अपने आप को एक जिम्मेवार राजनेता के रूप में प्रोजेक्ट कर सकते थे एवं भाजपा समर्थको के कुछ प्रतिशत वोट अपनी ओर खींच सकते थे।

लेकिन नहीं।

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मैं यह नहीं कह रहा कि इन्हे धरना-प्रदर्शन, बयानबाज़ी, निन्दा नहीं करनी चाहिए थी।

बल्कि, जब प्रधानमंत्री मोदी को भद्दी गालियां दी जा रही थी, उन्हें मारने की धमकी दी जा रही थी, तभी ऐसे लोगो की तथा उनके बयानों की निंदा करनी चाहिए थी। कहते कि हम राजनीतिक रूप से मोदी जी के विरोधी है, मानते है कि उनकी नीतियां ठीक नहीं है, लेकिन मारने की धमकी देने वालो के विरूद्ध कार्यवाई करनी चाहिए।

राहुल तो आसानी से कह सकता था कि उसकी पार्टी ने दो प्रधानमंत्रियों को हिंसा में खो दिया है, वह स्वयं ऐसी गालियों का शिकार रहा है, और वह ऐसी किसी भी धमकी एवं गाली की निंदा करता है। इस समय विक्टिम कार्ड खेल जाता।

लेकिन नहीं।

द्वितीय, यह दोनों कह सकते थे कि पेपर लीक्स सरकार की अकर्मण्यता से हुआ है और ऐसी लीक कई वर्षो से होती आ रही है। अतः वे सरकार के साथ ऐसी लीक को रोकने के लिए सहयोग करेंगे और अपने सार्थक सुझाव संसद के माध्यम से जनता के समक्ष रखेंगे।

लेकिन नहीं।

याद करिये जब मनमोहन सिंह को देहाती औरत कहा गया था, तब मुख्यमंत्री मोदी ने स्वयं इसकी निंदा की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं पहल ले ली है। और यह तय है कि इस समस्या पर भी कण्ट्रोल कर लिया जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे 370, आतंकी एवं नक्सल हमलो को कण्ट्रोल में लाया गया है।

अब राहुल एवं केजरी के पास केवल विरोध के नाम पर विरोध बचेगा।

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