सुरेंद्र किशोर : ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर मेरी राय
पद्म श्री अवार्डियों की पूछ बढ़ी
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(संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी ने देश के पद्म श्री अवार्डियों से यह
पूछा है कि आपकी राय में देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक बार फिर एक साथ होने चाहिए या नहीं।
जाहिर है कि मुझसे भी पूछा।
मैंने अपनी राय बहुत पहले उसे भेज दी थी।पर,समिति को मुझे यह बताने की फुर्सत नहीं मिली कि वह उन्हें मिली या नहीं।कोई बात नहीं।वे बड़े लोग हैं।
कहीं कोई यह न कह दे कि मैंने मांगने पर भी अपनी राय नहीं दी ,इस इल्जाम से बचने के लिए जेपीसी को भेजी गई अपनी राय को अपने फेसबुक वाॅल पर आज पोस्ट कर रहा हूं।)
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लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव
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एक बार फिर एक ही साथ होने चाहिए।
सन 67 तक तो एक साथ ही होते थे
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सुरेंद्र किशोर
(पद्म श्री अवार्डी–2024)
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मेरी राय है कि लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक बार फिर एक ही साथ होने चाहिए।
सन 1971 में लोक सभा का मध्यावधि चुनाव करवा कर इसे अलग -अलग कर दिया गया।
वैसा काम तब की सत्ता ने अपने दलीय हित में किया न कि राष्ट्रहित में।
उस गलती को अब सुधार दिया जाना चाहिए।
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यदि एक बार फिर चुनाव एक साथ होने लगे तो किसी दल को कोई नुकसान भी नहीं होगा।
1967 तक चार आम चुनाव तो एक ही साथ हुए थे।तब क्या किसी राजनीतिक दल ने यह शिकायत की थी कि एक साथ चुनाव कराने से उन्हें राजनीतिक नुकसान हो रहा है ?
शायद नहीं।उन्हें संविधान निर्माताओं के विवेक पर पूरा भरोसा था।मतदाताओं की जागरूकता पर भी।
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दूसरी ओर, यदि एक बार फिर एक साथ चुनाव होने लगे तो हजारों करोड़ रुपए बचेंगे।साथ ही, बार -बार आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी।आचार संहिता के कारण सरकारी विकास बाधित होता है।
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सन 1967 में एक ही साथ हुए।
चुनावों में मतदाताओं ने जहां सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनर्वाइं,वहीं तो केंद्र में कांग्रेस सरकार बनवा दी थी।
यानी,एक साथ चुनाव,अलग -अलग वोट देने के काम में बाधक नहीं बना।
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1957 में भी आम चुनाव के बाद केरल में वामपंथी सरकार बन गयी थी जबकि कंेद्र में कांग्रेस सरकार बनी।
संविधान निर्माताओं को इस देश के मतदाताओं के विवेक पर पूरा भरोसा था।
इसीलिए संविधान निर्माताओं ने एक नेशन एक इलेक्शन का प्रावधान किया।,
संविधान निर्माता जानते थे कि मतदातागण एक ही चुनाव के समय लोक सभा के लिए एक पार्टी और उसी चुनाव में विधान सभा के लिए दूसरी पार्टी को वोट दे सकते हैं,यदि वे वैसा चाहें तो।क्योंकि वे इतनी समझदारी से लैस हैं।
जिन सात राज्यों में 1967 में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं,उनमें बिहार भी था।
तब बिहार में लोक सभा की 53 सीटें थीं।
उनमें से 34 सीटें कांग्रेस को मिलीं।
पर, साथ ही हुए बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल सका।
याद रहे कि 1967 के चुनाव में तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस की ही सरकारें बन गयी थीं।
पर,कुछ कांग्रेसियों के दल बदल के कारण उन दोनों राज्यों में कुछ ही महीने बाद गैर कांगे्रसी सरकारें बन गयीं थीं।
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याद रहे कि कांग्रेस की इंदिरा गांधी सरकार ने 1971 में समय से एक साल पहले ही लोक सभा चुनाव करवा कर विधान सभाओं के चुनाव से लोक सभा चुनाव को अलग कर दिया।
सी.पी.आई.तथा कुछ अन्य दलों की ओर से श्रीमती गांधीकी सरकार पर जारी दबाव से मुक्त होने के लिए प्रधान मंत्री ने समय से पहले लोक सभा चुनाव करा दिया।
इंदिरा कांग्रेस का तब लोक सभा में खुद का बहुमत नहीं था।सन 1969 में कांग्रेस में महा विभाजन के बाद अपनी सरकार को बचाने के लिए इंदिरा गांधी कुछ दलों पर निर्भर थीं।‘‘गरीबी हटाओ’’ के नारे और कुछ अन्य लोक लुभावन कामों के कारण इंदिरा गांधी की लोकप्रियता बढ़ गई थी।उन्हें विश्वास हो गया था कि समय से पहले लोक सभा चुनाव करा लेने से उन्हें बहुमत मिल जाएगा।उसके बाद वह बाहरी दबाव से मुक्त हो जाएंगी। यही हुआ भी।इंदिरा गांधी ने सोचा कि सन 1972 तक प्रतीक्षा करने पर शायद तब तक उनकी उतनी लोकप्रियता शायद न रहे।
सन् 1971 के चुनाव में लोक सभा में पूर्ण बहुमत पा लेने के बाद प्रधान मंत्री ने सचमुच ‘गरीबी हटाने’ की दिशा में जल्द ही कोई ठोस काम किया होता तो समय पूर्व चुनाव का यह तर्क सही माना जा सकता था।
लोक सभा के मध्यावधि चुनाव के साथ एक और गड़बड़ी हो गई।सन् 1967 तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे।इससे सरकारों,दलों और उम्मीदवारों को कम खर्चे लगते थे।सन् 1971 के बाद ये चुनाव अलग- अलग समय पर होने लगे।इससे खर्चे काफी बढ़ गए।इस कारण राजनीति में काला धन की आमद भी बढ़ गयी।
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