अमित सिंघल : जैसे वर्ष 2014 पूर्व पेपर लीक्स होते ही नहीं थे, समाधान अब संभव है

पेपर लीक्स को लेकर हाहाकार मचा हुआ है।
मचना भी चाहिए।
इसकी ओट में मोदी सरकार की ऐसी आलोचना करना कि जैसे वर्ष 2014 पूर्व पेपर लीक्स होते ही नहीं थे।

1980 के दशक में जब मैंने जौनपुर से इंटरमीडिएट की परीक्षा दी थी, तब विद्यालय के गुरुजन परीक्षा सेंटर के नीचे खड़े होकर परीक्षार्थियों को ऊपर पर्ची भेज रहे थे। परिणाम यह हुआ कि सामूहिक नकल के कारण हमारा रिजल्ट विथहेल्ड हो गया था। अब चाहे आपने नक़ल की हो या ना की हो, सभी लपेटे में आ गए थे।

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फिर मुख्यमंत्री कल्याण सिंह यूपी में नक़ल के विरूद्ध कठोर कानून (Anti-Copying Act, 1992) लेकर आये थे। इसके विरोध में विपक्षी दलों ने कैंपेन किया। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकार, जो 1993 में सत्ता में आई थी, ने अगले ही वर्ष इसे निरस्त कर दिया।

लखनऊ में हमारे एक परिचित थे। 1990 के दशक में इनके पुत्र का किसी भी संस्थान में एडमिशन नहीं हो रहा था। फिर एकाएक लखनऊ के एक मैनेजमेंट संस्थान में एडमिशन हो गया। ऑन्टी जी ने स्वयं बताया कि पुत्र को प्रवेश परीक्षा के पेपर मिल गए थे।

एक सिंपल इंटरनेट सर्च बतला रही है है कि सोनिया सरकार के समय में, गैर-भाजपा सरकार वाले राज्यों में दर्ज़नो पेपर लीक्स के केस हुए थे और हो रहे है। अकेले राजस्थान में अशोक गहलौत के समय पेपर लीक्स के 14 केस पुलिस ने रजिस्टर किया था।

इस लेख के द्वारा किसी भी सरकार को डिफेंड नहीं कर रहा हूँ। केवल यह बतलाने का प्रयास है कि इस पेपर लीक्स एवं नकल के विशाल कुटीर उद्योग में बहुत से माता-पिता, अध्यापक, छात्र, सरकारी कर्मी – सभी पूरे परिश्रम से सम्मिलित है।

एक समय नेतागण भी आँख मूँद लेते थे। आखिरकार उन्हें कल्याण सिंह का उदाहरण याद है।

लेकिन मोदी सरकार के समय में इस आपराधिक कृत्य से निपटने का सिनसियर प्रयास हो रहा है। प्रश्न यह है कि समाधान क्या है? क्या करना होगा?

जब तक इतनी विशाल परीक्षा पेपर-बेस्ड है, कहीं ना कहीं से लीक हो जाएगा। लीक रोकने का एक उपाय यह है कि पूरा टेस्ट ऑनलाइन कर दिया जाए।

परीक्षा के समय प्रश्न पेपर एक ही बार में, एक ही समय रिलीज़ किया जाए। प्रत्येक प्रत्याशी के लिए प्रश्नो की सीरीज को उल्टा-पुल्टा कर दिया जाए।

लेकिन इसके लिए 23-24 लाख कम्प्यूटर्स की व्यवस्था करनी होगी, परीक्षा केन्द्रो को कंप्यूटर, एवं बिना अवरोध के बिजली-इंटरनेट के लिए उपयुक्त बनाना होगा। साथ ही, साइबर सिक्योरिटी की व्यवस्था करनी होगी। इसमें कोई मिडलमेन नहीं रहेगा। अगले वर्ष से सरकार यही व्यवस्था लाने का विचार कर रही है।

अब ऑनलाइन में समस्या यह है कि सरकार ने 25 लाख कम्प्यूटर्स की व्यवस्था कर ली। हर वर्ष उसका सॉफ्टवेयर अपडेट करना होगा, उसका एंटी-वायरस सिस्टम चेक करना होगा। उसे कहीं किसी गोदाम में रखना होगा। और फिर हर 5-6 वर्ष में नया कंप्यूटर खरीदना होगा।

सरकार सकारात्मक रूप से कार्य कर रही है। अगर EVM से चुनाव करवाए जा सकते है (यद्यपि EVM किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़ा होता है; बैटरी से चलता है; एक EVM पर एक बूथ पर सैकड़ो लोग वोट दे सकते है), उन लाखो EVM को सुरक्षित रखा जा सकता है, तो प्रतियोगी परीक्षा के लिए 25 लाख कम्प्यूटर्स की व्यवस्था भी की जा सकती है। EVM के विपरीत एक कंप्यूयटर पर केवल एक ही प्रत्याशी प्रश्न हल कर सकता है।

एक समय 370 भी भीषण समस्या थी। अब नहीं है। नक्सल हिंसा थी, अब नहीं है। सरकारी बैंक डूबने के कगार पर थे, अब नहीं है।

इसी मोदी सरकार में पेपर लीक्स की समस्या का भी उन्मूलन हो जाएगा।

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