प्रसिद्ध पातकी : अनुत्तम ; भगवान की विचित्र दुविधा
अपने ये जो भगवान श्रीहरि हैं, उनके साथ एक बड़ी प्रॉब्लम है। क्या प्रॉब्लम है? इनसे कहा जाए कि जरा अपने जैसा कोई दूसरा ढूंढ कर बता दीजिए तो बस इनके लिए मुश्किल ही खड़ी हो जाएगी। इस बात को भगवान ने मनु और शतरूपा के समक्ष स्वयं स्वीकार किया है। इस दंपत्ति ने बहुत कठोर तपस्या की। भक्तवत्सल श्रीहरि इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और कोई वर मांगने को कहा। मनु महाराज ने हाथ जोड़कर कहा कि उन्हें तो बस प्रभु के समान पुत्र चाहिए-‘चाहउँ तम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।’
मांगने वाले ने कोई दुराव-छिपाव किए बिना सीधे-सीधे मांग डाला और दुविधा में पड़ गया देने वाला। श्रीहरि के मुख से निकला कि अब बताओ मैं अपने समान कहां से दूसरा ढूंढ कर लाऊं-‘‘आप सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।।’’
भगवान अपने जैसा दूसरा कोई ढूंढ ही नहीं सकते हैं क्योंकि उनसे उत्तम कोई है ही नहीं। इसीलिए वे ‘अनुत्तम’ हैं। इस नाम को भीष्म दादा ने विष्णु सहस्रनाम में शामिल किया है :-
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रम: क्रम:।
अनुत्तमो दुराधर्ष: कृतज्ञ: कृतिरात्मवान्।।
भगवान से उत्तम कुछ है ही नहीं। कुछ हो ही नहीं सकता। गीता में भगवान ने कहा है कि उनसे परे कुछ भी नहीं है :-
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।
इस सृष्टि में जितने प्राणी और वस्तुएं हैं, भगवान उनके भीतर इसी तरह बिंधे हुए हैं या उपस्थित हैं जैसे मणियों की माला में सूत का धागा पिरोया रहता है। वेद भगवान उद्घोष करते हैं, ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’ यानी पुरुष रूपी जो ईश्वर हैं, वह सभी में व्याप्त हैं, जो हो चुके हैं, उनमें भी और जो होने वाले हैं, उनमें भी।
किंतु रसिक जन के समक्ष भगवान को अपना पुरुष ही नहीं पुरुषोत्तम स्वरूप भी प्रकट करना पड़ता है। जो पुरुष से भी उत्तम है। पुरुष से भी ऊपर है। यह स्वरूप आवश्यक नहीं है कि हर बार आपके समक्ष अपना विराट रूप प्रकट करे। भगत की मार्मिक पुकार हो तो यह पुरुषोत्तम चीर बढ़ाकर निस्सहाय द्रौपदी की रक्षा करते हैं। अहिल्या को शाप मुक्त कर उसके अस्तित्व का स्पंदन बन जाते हैं।
ध्यान रखिए कि इस वर्ष पुरुषोत्तम मास आ रहा है। 17 मई से यह प्रारंभ होगा। इस माह में गीता पढ़िए, विशेषतौर पर पन्द्रहवां अध्याय। इसमें भगवान ने उन रहस्यों से पर्दा उठाया है कि आखिर वह पुरुषोत्तम क्यों हैं? इस रहस्य पर विचार करिए, इसे हृदयंगम करिए। तभी पुरुषोत्तम मास की सार्थकता आपके जीवन में उतरेगी।
‘‘अनुत्तम’ भगवान पुरुषोत्तम की मोहिनी लीला, मनमोहन स्वरूप भक्त के हृदय राज्य में निरंतर आनन्द और रस की वर्ष करता रहता है, यही भगवान श्रीमन्नारायण के श्रीचरणों में प्रार्थना है।
एकादशी की राम राम


