कौशल सिखौला : एनडीए की परीक्षा, विपक्ष की चुनौती और भविष्य की राजनीति
सियासत की नई बिसात..
अब सीटों का नहीं, भविष्य की सत्ता का खेल है राजनीति..
संसद का आने वाला मानसून सत्र एनडीए सरकार की कड़ी परीक्षा लेने वाला है । बिहार , बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में हुए आमूलचूल परिवर्तनों ने राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है । दिल्ली में मानसून की बारिश ढंग से शुरू होने से पहले ही सियासत का पारा चढ़ चुका है । वजह केवल संसद का मानसून सत्र नहीं, बल्कि वे फैसले हैं जो आने वाले दशक की राजनीति का चेहरा बदल सकते हैं । परिसीमन, महिला आरक्षण और नए विधेयकों की आहट ने सत्ता और विपक्ष दोनों के राजनीतिक गणित को उलझा दिया है ।
हम जानते हैं कि भारतीय राजनीति में न दोस्ती स्थायी होती है, न दुश्मनी । स्थायी होती है तो केवल सत्ता की तलाश और सत्ता का रास्ता सीटों से होकर गुजरता है। इसलिए जब भी परिसीमन की चर्चा होती है, नेताओं की चिंता लोकतंत्र से पहले अपने चुनावी भविष्य को लेकर बढ़ जाती है । परिसीमन का अर्थ केवल नई सीमाएं खींचना नहीं है ।
इसका मतलब है कि कई नेताओं की वर्षों से सुरक्षित मानी जाने वाली सीटें बदल सकती हैं, कई क्षेत्रों का सामाजिक समीकरण बदल सकता है और कुछ राज्यों का राजनीतिक महत्व बढ़ या घट सकता है । यही कारण है कि जो दल आज सार्वजनिक रूप से सिद्धांतों की बात कर रहे हैं, वे भीतर ही भीतर अपने चुनावी गणित के नए सूत्र तलाश रहे हैं ।
महिला आरक्षण ने इस समीकरण को और जटिल बना दिया है । चूंकि मामला महिलाओं से जुड़ा है अतः कोई भी दल खुलकर इसका विरोध नहीं कर सकता । लेकिन लगभग हर दल के भीतर यह चिंता जरूर है कि जब एक-तिहाई या 50 % सीटें आरक्षित होंगी, तब पुराने नेताओं का क्या होगा ? टिकट किसे मिलेगा ? नए नेतृत्व को कैसे तैयार किया जाएगा ?
यह सवाल अभी से राजनीतिक दलों के बंद कमरों में चर्चा का विषय बन चुके हैं । सरकार इस पूरे एजेंडे को बड़े लोकतांत्रिक सुधार के रूप में पेश कर रही है । लेकिन महिलाओं के बढ़ने से संसद में पुरुषों की संख्या कम होने का खासा असर सत्तारूढ़ एनडीए पर भी पड़ेगा । विपक्ष चाहता है कि इन बदलावों पर व्यापक चर्चा हो और सभी पक्षों को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए । आने वाले सत्र में यह मतभेद और स्पष्ट होकर सामने आ सकता है ।
संसद में आने वाले विधेयकों पर सभी की नजर रहेगी । सरकार उन्हें सुधारों की दिशा में कदम बताएगी, जबकि विपक्ष उनकी समीक्षा और संभावित प्रभावों पर सवाल उठाएगा । लोकतंत्र में यही स्वाभाविक प्रक्रिया है—सरकार निर्णय रखती है, विपक्ष उनकी परीक्षा लेता है । हालांकि भारतीय राजनीति में फैला विषैला जहर कुछ भी सामान्य नहीं रहने देता । लेकिन इस बार असली कहानी संसद के भीतर नहीं, संसद के बाहर लिखी जा रही है ।
राजनीतिक दल केवल इस सत्र की तैयारी नहीं कर रहे, बल्कि अगले आम चुनावों और उसके बाद की राजनीति का खाका भी बना रहे हैं । अफसोस की बात यह है विपक्ष के पास नीतियां बनाने वाला कोई एक नेता और एक सर्वमान्य नहीं बचा है ? फिर कहें तो राहुल गांधी में इंडी गठबंधन का नेतृत्व संभालने की क्षमता नहीं है । विपक्ष इसी लिए बिखराव का शिकार है । राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव मैदान में नहीं, रणनीति की मेज पर जीते जाते हैं । लगता है कि इस बार भी असली मुकाबला वहीं से शुरू हो चुका है । मानसून सत्र तो केवल पहला अध्याय है, पूरी कहानी अभी बाकी है ।


